नैनीताल उत्तराखंड शंकराचार्य माधव आश्रम मंदिर के शिवलिंग में आई दरारें, भू-धंसाव का बढ़ा दायरा, तस्वीरें

रिपोर्टर कपिल स्क्सैना जिला नैनीताल उत्तराखंड
बता दे की आदि गुरु शंकराचार्य मठस्थली भी भू धंसाव का शिकार होने लगी है। वहीं मठस्थली में मौजूद शिव मंदिर करीब छह इंच धंस गया है और यहां रखे हुए शिवलिंग में दरारें आ गई हैं। मंदिर के ज्योर्तिमठ का माधवाश्रम आदि शंकराचार्य ने बसाया था।और यहां देशभर से विद्यार्थी वैदिक शिक्षा व ज्ञानार्जन के लिए आते हैं। वर्तमान में भी 60 विद्यार्थी यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
वहीं आदि गुरु शंकराचार्य मठस्थली के भीतर ही शिवमंदिर है।और इस मंदिर में वर्ष 2000 में एक शिवलिंग जयपुर से लाकर स्थापित किया गया था।वहीं मंदिर के पुजारी श्री वशिष्ठ ब्रहम्चारी ने बताया कि पिछले करीब 12-13 माह से यहां धीरे-धीरे दरारें आ रहीं थीं, जिन्हें सीमेंट लगाकर रोकने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन पिछले सात-आठ दिन में हालात बिगड़ने लगे हैं।मंदिर करीब छह से सात इंच नीचे की ओर धंस चुका है। दीवारों के बीच गैप बन गया है, जिससे बाहर की रोशनी आ रही है। मंदिर में जो शिवलिंग विराजमान है, पहले उस पर चंद्रमा के आकार का निशान था जो कि अब अचानक बढ़ गया है। मंदिर के भीतर लगी टाइलें भी उखड़ गई हैं।

और जब मंदिर के पुराजी श्री वरिष्ठ ब्रहम्चारी से प्रतिमा खंडित होने के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि भगवान शंकर कण-कण में विराजमान होते हैं। और इसे खंडित नहीं माना जाता है।वहीं यहां के लिंगों का वर्णन इतिहास और पुराणों में है। उन्होंने बताया कि इसी प्रकार, हिमाचल में बिजलेश्वर महादेव है। जब भी बिजली कड़कती है, शिवलिंग के कई टुकड़े होते हैं। लेकिन उसे खंडित नहीं माना जाता।जोशीमठ के नृसिंह मंदिर स्थित आदि गुरु शंकराचार्य का गद्दीस्थल भी भू धंसाव के खतरे में आ रहा है। यहां नृसिंह मंदिर परिसर में ही आदि गुरु शंकराचार्य का गद्दीस्थल है। माना जाता है कि मंदिर तो प्राचीन है ही लेकिन आदि गुरु शंकराचार्य का गद्दीस्थल भी 8वीं शताब्दी के करीब का है।
साथ ही आपको बता दे की प्राचीन शैली से निर्मित यह भवन भी खतरे की जद में है। हर साल यहां से आदि गुरु शंकराचार्य की पालकी बनती है। और वह गद्दी बदरीविशाल में जाती है और इसी प्रकार, पांडुकेश्वर से उद्धव और कुबेर जी की पालकी बनकर बदरीविशाल जाती है। और जब कपाट बंद हो जाते हैं तो उद्धव व कुबेर जी की पालकी पांडुकेश्वर और आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी नृसिंह मंदिर स्थित गद्दीस्थल में लौट आती है।
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