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Rajasthan News भक्ति किस प्रभु की करनी चाहिए’’ गीता अनुसार (भाग-2)

रिपोर्टर मीना देवी सतलोक आश्रम सोजत पाली राजस्थान

परमेश्वर कबीर जी ने तत्वज्ञान में सब ज्ञान बताया है। गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में भी कहा है कि यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी (ब्रह्मणः मुखे) सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म ने अपने मुख कमल से बोली, वाणी मंे विस्तार के साथ कही है, वह तत्वज्ञान है। गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि जो तत्वज्ञान परमात्मा स्वयं बताता है। उसको उसके कृपा पात्रा सन्त ही समझते हैं। उस तत्वज्ञान को तू तत्वदर्शी सन्तों के पास जाकर समझ। उनको दण्डवत् प्रणाम (पृथ्वी पर पेट के बल लम्बा लेटकर प्रणाम) करके, नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। परमेश्वर ने यह तत्वज्ञान स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर बताया था। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई है कि जो सन्त संसार रूपी वृक्ष को मूल (जड़) से लेकर सर्व अंगों को जानता है, वह तत्वदर्शी सन्त है।

अब जानें संसार रूपी वृक्ष के सर्र्वांग :-

1. मूल (जड़) :- यह परम अक्षर ब्रह्म है जो सबका मालिक है। सबकी उत्पत्ति करता है। सबका धारण-पोषण करने वाला है जिसकी जानकारी गीता अध्याय 8 श्लोक 1 के प्रश्न का उत्तर गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 3, 8, 9, 10 तथा 20, 21, 22 में दिया है। उसी का वर्णन गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है। जैसे गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में दो पुरूष बताए हैं:- एक “क्षर पुरूष” दूसरा “अक्षर पुरूष”, ये दोनों तथा इनके अन्तर्गत जितने शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब नाशवान हैं। जीव आत्मा तो किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 के ही श्लोक 17 में कहा है कि (उत्तम पुरूषः) अर्थात् पुरूषोत्तम तो (अन्यः) अन्य ही है जिसे (परमात्मा इति उदाहृतः) परमात्मा कहा जाता है (यः लोक त्रायम्) जो तीनों लोकों में (अविश्य विभर्ती) प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है (अव्ययः ईश्वरः) अविनाशी परमेश्वर है, यह परम अक्षर ब्रह्म संसार रूपी वृक्ष की मूल (जड़) रूप परमेश्वर है। यह वह परमात्मा है जिसके विषय में सन्त गरीब दास जी ने कहा है:- “भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का” यह असँख्यों ब्रह्माण्डांे का मालिक है। यह क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष का भी मालिक तथा उत्पत्तिकर्ता है।

2. अक्षर पुरूष :- यह संसार रूपी वृक्ष का तना जानें। यह 7 शंख ब्रह्माण्डों का मालिक है, नाशवान है।

3. क्षर पुरूष :- यह गीता ज्ञान दाता है, इसको “क्षर ब्रह्म” भी कहते हैं। यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का मालिक है, नाशवान है।

4. तीनों देवता (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) तीन शाखाऐं :- ये एक ब्रह्माण्ड में बने तीन लोकों (पृथ्वी लोक, पाताल लोक तथा स्वर्ग लोक) में एक-एक विभाग के मन्त्राी हैं, मालिक हैं।

जैसे = रजगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी मालिक हैं, जिसके प्रभाव से सर्व प्राणी सन्तानोत्पत्ति करते हैं। सतगुण विभाग के श्री विष्णु जी मालिक हैं, जिससे एक-दूसरे में ममता बनी रहती है, कर्मानुसार सर्व का किया फल देते हैं। तमोगुण विभाग के श्री शंकर जी मालिक हैं, जिसके कारण सर्व का अन्त होता है और पात रूप में संसार के प्राणी जानो। यह है संसार रूपी वृक्ष के सर्र्वांगों की भिन्न-भिन्न जानकारी। यह ज्ञान स्वयं परमेश्वर कबीर जी ने अपने मुख कमल से बोला था। वह कबीर वाणी, कबीर बीजक, कबीर शब्दावली तथा कबीर सागर में श्री धनी धर्मदास (बाँधवगढ़ वाले) द्वारा लिखा गया था। उस परमेश्वर ने तो बताया ही था या वर्तमान में इस दास (संत रामपाल दास) ने समझा है। यह कृपा परमेश्वर कबीर जी की ही है कि सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान मुझे प्राप्त है।

गीता अध्याय 15 श्लोक 1 के अनुसार तत्वदर्शी सन्त की पहचान से भी यह सिद्ध हुआ कि यह दास (संत रामपाल दास) वह तत्वदर्शी सन्त है। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16 से 17 का सांराश रूप चित्र। पुनः प्रसंग पर आते हैं कि ‘‘भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का।‘‘ अभी तक तो यही बताया है कि भक्ति करनी चाहिए परंतु अब यह स्पष्ट करते हैं कि भक्ति किसकी करें? 1. श्री ब्रह्मा जी रजगुण की या 2. श्री विष्णु जी सतगुण की या 3. तमगुण श्री शिव जी रूपी तीनों शाखाओं की या फिर 4. क्षर पुरूष गीता ज्ञान दाता डार की या 5. अक्षर पुरूष तना की या 6. परम अक “भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का” श्रीमद् भगवत् गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16.17 में कहा है कि यह संसार ऐसा है जैसे पीपल का वृक्ष है। जो संत इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष की मूल (जड़ों) से लेकर तीनों गुणों रूपी शाखाओं तक सर्वांग भिन्न-भिन्न बता देता है। (सः वेद वित्) वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है अर्थात् वह तत्वदर्शी सन्त है। अपने द्वारा रची सृष्टि का ज्ञान तथा वास्तविक आध्यात्म ज्ञान परमात्मा स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने मुख कमल से सुनाता है। प्रमाण के लिए पढ़ें निम्न वेद मंत्र। इन मंत्रों की फोटोकापी कृप्या देखें पुस्तक ‘‘गीता तेरा ज्ञान अमृत‘‘ में जिनका अनुवाद आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद तथा उसके अनुयाईयों ने किया है। उसकी त्राुटियाँ लेखक (संत रामपाल दास) ने शुद्ध की हैं।

ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मन्त्र 26-27, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 82 मन्त्र 1-2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 96 मन्त्र 16 से 20, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 94 मन्त्र 1, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मन्त्र 2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मन्त्र 1 में प्रमाण है कि जो सर्व ब्रह्माण्डों का रचनहार, सर्व का पालनहार परमेश्वर है। वह सर्व भुवनों के ऊपर के लोक में बैठा है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3) वह परमात्मा वहाँ से गति करके अर्थात् सशरीर चलकर यहाँ पृथ्वी पर आता है, भक्तों के संकटों का नाश करता है। उसका नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है। यहाँ पर अच्छी आत्माओं को मिलता है, उनको तत्वज्ञान अपने मुख कमल से बोलकर बताता है। वह परमात्मा ऊपर के लोक में बैठा है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मन्त्र 26-27, मण्डल 82 मन्त्र 1-2 तथा मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मन्त्र 1)

परमात्मा पृथ्वी पर कवियों की तरह आचरण करता हुआ विचरण करता है।
(ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 94 मन्त्र 1)

परमात्मा अपने मुख से वाणी बोलकर साधकों को भक्ति करने की प्रेरणा करता है। परमात्मा भक्ति के गुप्त मन्त्रों का आविष्कार करता है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मन्त्र 2)

परमात्मा तत्वज्ञान को कविर्वाणी (कबीर वाणी) द्वारा लोकोक्तियों, दोहों, चैपाईयों द्वारा बोलकर सुनाता है। वह कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है जो सन्त रूप में प्रकट होता है। उस परमेश्वर द्वारा ऋषि या सन्तों द्वारा रची असँख्यों वाणियाँ जो तत्वज्ञान है, वे उसके अनुयाईयों के लिए अमृत तुल्य आनंददायक होती हैं। वह परमेश्वर प्रसिद्ध कवियों में से भी एक प्रसिद्ध कवि की पदवी भी प्राप्त करते हैं। उनको कवि कहते हैं, परंतु वह परमात्मा होता है। वह परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम (सत्यलोक) में विराजमान है। जैसे मनुष्य अन्य वस्त्रा धारण करता है, ऐसे ही वह परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में पृथ्वी पर प्रकट होता है। उपरोक्त ऋग्वेद के मन्त्रों से स्पष्ट है कि परमात्मा अपने अमर धाम से चलकर पृथ्वी पर प्रकट होता है। वह अच्छी आत्माओं को मिलता है। वह तत्वदर्शी सन्त की भूमिका करके तत्व ज्ञान दोहों, चैपाईयों, शब्दों द्वारा बोलता है। उस परमेश्वर ने सन् 1398 से 1518 तक 120 वर्ष पृथ्वी पर भारत वर्ष की पावन धरती पर काशी शहर में जुलाहे (धाणक) के रूप में रहकर तत्वज्ञान बताया था।

कबीर, अक्षर पुरूष एक पेड़ है, क्षर पुरूष वाकी डार।
तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।

विशेष :- कबीर वाणी पुस्तक में एक वाणी ऐसे भी लिखी है:-

कबीर, अक्षर पुरूष वृक्ष का तना है, क्षर पुरूष है डार।
त्रायदेव शाखा भए, पात जानों संसार।।

सरलार्थ:- वृक्ष का जो हिस्सा पृथ्वी से बाहर दिखाई देता है। उसकी जानकारी बताई है कि वृक्ष का जो तना होता है, उसे तो “अक्षर पुरूष” जानें। तने के ऊपर कई मोटी डार निकलती हंै, उनमें से एक डार को ‘‘क्षर पुरूष‘‘ जानें। फिर उस डार के मानों तीन शाखा निकली हैं। वे तीनों देवता:- (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) जानें और उन शाखाओं पर लगे पत्ते जीव-जन्तु जानें।

परमेश्वर कबीर जी ने तत्वज्ञान में सब ज्ञान बताया है। गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में भी कहा है कि यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी (ब्रह्मणः मुखे) सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म ने अपने मुख कमल से बोली, वाणी मंे विस्तार के साथ कही है, वह तत्वज्ञान है। गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा है कि जो तत्वज्ञान परमात्मा स्वयं बताता है। उसको उसके कृपा पात्रा सन्त ही समझते हैं। उस तत्वज्ञान को तू तत्वदर्शी सन्तों के पास जाकर समझ। उनको दण्डवत् प्रणाम (पृथ्वी पर पेट के बल लम्बा लेटकर प्रणाम) करके, नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। परमेश्वर ने यह तत्वज्ञान स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर बताया था। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई है कि जो सन्त संसार रूपी वृक्ष को मूल (जड़) से लेकर सर्व अंगों को जानता है, वह तत्वदर्शी सन्त है।

अब जानें संसार रूपी वृक्ष के सर्र्वांग :-

1. मूल (जड़):- यह परम अक्षर ब्रह्म है जो सबका मालिक है। सबकी उत्पत्ति करता है। सबका धारण-पोषण करने वाला है जिसकी जानकारी गीता अध्याय 8 श्लोक 1 के प्रश्न का उत्तर गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 3, 8, 9, 10 तथा 20, 21, 22 में दिया है। उसी का वर्णन गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है। जैसे गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में दो पुरूष बताए हैं :- एक “क्षर पुरूष” दूसरा “अक्षर पुरूष”, ये दोनों तथा इनके अन्तर्गत जितने शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब नाशवान हैं। जीव आत्मा तो किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 के ही श्लोक 17 में कहा है कि (उत्तम पुरूषः) अर्थात् पुरूषोत्तम तो (अन्यः) अन्य ही है जिसे (परमात्मा इति उदाहृतः) परमात्मा कहा जाता है (यः लोक त्रायम्) जो तीनों लोकों में (अविश्य विभर्ती) प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है (अव्ययः ईश्वरः) अविनाशी परमेश्वर है, यह परम अक्षर ब्रह्म संसार रूपी वृक्ष की मूल (जड़) रूप परमेश्वर है। यह वह परमात्मा है जिसके विषय में सन्त गरीब दास जी ने कहा है:- “भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का” यह असँख्यों ब्रह्माण्डांे का मालिक है। यह क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष का भी मालिक तथा उत्पत्तिकर्ता है।

2. अक्षर पुरूष:- यह संसार रूपी वृक्ष का तना जानें। यह 7 शंख ब्रह्माण्डों का मालिक है, नाशवान है।

3. क्षर पुरूष:- यह गीता ज्ञान दाता है, इसको “क्षर ब्रह्म” भी कहते हैं। यह केवल 21 ब्रह्माण्डों का मालिक है, नाशवान है।

4. तीनों देवता (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) तीन शाखाऐं:- ये एक ब्रह्माण्ड में बने तीन लोकों (पृथ्वी लोक, पाताल लोक तथा स्वर्ग लोक) में एक-एक विभाग के मन्त्राी हैं, मालिक हैं।

जैसे = रजगुण विभाग के श्री ब्रह्मा जी मालिक हैं, जिसके प्रभाव से सर्व प्राणी सन्तानोत्पत्ति करते हैं। सतगुण विभाग के श्री विष्णु जी मालिक हैं, जिससे एक-दूसरे में ममता बनी रहती है, कर्मानुसार सर्व का किया फल देते हैं। तमोगुण विभाग के श्री शंकर जी मालिक हैं, जिसके कारण सर्व का अन्त होता है और पात रूप में संसार के प्राणी जानो। यह है संसार रूपी वृक्ष के सर्र्वांगों की भिन्न-भिन्न जानकारी। यह ज्ञान स्वयं परमेश्वर कबीर जी ने अपने मुख कमल से बोला था। वह कबीर वाणी, कबीर बीजक, कबीर शब्दावली तथा कबीर सागर में श्री धनी धर्मदास (बाँधवगढ़ वाले) द्वारा लिखा गया था। उस परमेश्वर ने तो बताया ही था या वर्तमान में इस दास (संत रामपाल दास) ने समझा है। यह कृपा परमेश्वर कबीर जी की ही है कि सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान मुझे प्राप्त है। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 के अनुसार तत्वदर्शी सन्त की पहचान से भी यह सिद्ध हुआ कि यह दास (संत रामपाल दास) वह तत्वदर्शी सन्त है। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16 से 17 का सांराश रूप चित्र। पुनः प्रसंग पर आते हैं कि ‘‘भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का।‘‘ अभी तक तो यही बताया है कि भक्ति करनी चाहिए परंतु अब यह स्पष्ट करते हैं कि भक्ति किसकी करें? 1. श्री ब्रह्मा जी रजगुण की या 2. श्री विष्णु जी सतगुण की या 3. तमगुण श्री शिव जी रूपी तीनों शाखाओं की या फिर 4. क्षर पुरूष गीता ज्ञान दाता डार की या 5. अक्षर पुरूष तना की या 6. परम अक्षर पुरूष = मूल की।

उदाहरण:- यदि हम नर्सरी से कोई आम का पौधा लाते हैं, उसको अपने खेत या घर के आँगन में रोपते हैं तो कैसे रोपते हैं?

जमीन में गढ्ढ़ा खोदते हैं, पौधे की मूल (जड़ों) को गढ्ढ़े में रखकर मिट्टी से ढ़क देते हैं। फिर पौधे की मूल (जड़ों) में पानी से सिंचाई करते हैं, खाद डालते हैं अर्थात् पौधे की जड़ की पूजा करते हैं। जड़ों से आहार तने में, तना अपने अनुसार आहार रखकर बचा हुआ आगे डार में भेज देता है। डार अपने लिए आवश्यक आहार रखकर शेष शाखाओं में भेज देती है। इसी प्रकार शाखाऐं शेष भोजन पत्तों तक भेजती हैं। इस प्रकार वह पौधा पेड़ बनकर फल देता है। पाठक जन बहुत बुद्धिमान हैं। समझ गए होंगे कि हमने किस परमात्मा की पूजा करनी चाहिए? सूक्ष्मवेद में परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि:-

कबीर, एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय।
माली सींचै मूल कूँ, फूलै फलै अघाय।।

एक मूल मालिक की पूजा करने से सर्व देवताओं की पूजा हो जाती है जो शास्त्रानुकूल है। जो तीनों देवताओं में से एक या दो (श्री विष्णु सतगुण तथा श्री शंकर तमगुण) की पूजा करते हैं या तीनों की पूजा ईष्ट रूप में करते हंै तो वह गीता अध्याय 13 श्लोक 10 में वर्णित अव्यभिचारिणी भक्ति न होने से व्यर्थ है। जैसे कोई स्त्राी अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरूष से शारीरिक सम्बन्ध नहीं करती, वह अव्यभिचारिणी स्त्राी है। जो कई पुरूषों से सम्पर्क करती है, वह व्यभिचारिणी होने से समाज में निन्दनीय होती है। वह पति के दिल से उतर जाती है। शास्त्रानुकूल साधना अर्थात् सीधा बीजा हुआ भक्ति रूपी पौधे का चित्र व शास्त्राविरूद्ध साधना अर्थात् उल्टा बीजा हुआ भक्ति रूपी पौधा देखें। उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट हुआ कि एक मूल मालिक की भक्ति करने से साधक का आत्म-कल्याण सम्भव है।

अन्य प्रमाण:- गीता अध्याय 3 श्लोक 10 से 15 में इसी उपरोक्त भक्ति का समर्थन किया है।

गीता अध्याय 3 श्लोक 10 = प्रजापति ने अर्थात् कुल के मालिक ने सृष्टि के आदि में यज्ञ सहित अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों के ज्ञान सहित प्रजाओं को उत्पन्न करके आदेश दिया था कि तुम सब धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ। यह यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान तुम लोगों को ईच्छित भोग प्रदान करने वाले हैं। (गीता अध्याय 3 श्लोक 10) इस शास्त्रानुकूल धार्मिक अनुष्ठान द्वारा देवताओं (संसार रूपी पौधे की शाखाओं) को उन्नत करो अर्थात् पूर्ण परमात्मा (मूल मालिक) को ईष्ट मानकर साधना करने से शाखाऐं अपने आप उन्नत हो जाती हैं जैसाकि पूर्व में स्पष्ट हो चुका है। फिर वे देवता (शाखाऐं बड़ी होकर फल देंगी) तुम लोगांे को उन्नत करें अर्थात् जब हम शास्त्रानुकूल साधना करेंगे तो हमारे भक्ति कर्म बनंेगे, कर्मों का फल ये तीनों देवता (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी रूपी शाखाऐं ही) देते हैं। इस प्रकार एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम्हारा कल्याण होगा तथा इससे दूसरे परमात्मा को प्राप्त हो जाओगे। (यह ज्ञान गीता ज्ञान दाता बता रहा है) (गीता अध्याय 3 श्लोक 11) अ शास्त्रानुकुल किए यज्ञ अर्थात् अनुष्ठानों द्वारा बढ़ाए हुए देवता अर्थात् संसार रूपी पौधे की शाखाऐं तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। जैसे पौधे की मूल की सिंचाई करने से पौधा पेड़ बन जाता है व शाखाऐं फलों से लदपद हो जाती हैं। फिर उस वृक्ष की शाखाऐं अपने आप प्रतिवर्ष फल देती रहेंगी यानि आप जी का किया शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म का फल जो संचित हो जाता है, उसे यही देवता आपको देते रहेंगे, आप माँगो या न माँगो। यदि उन देवताओं द्वारा दिया गया आपका कर्म संस्कार का धन पुनः धर्म में नहीं लगाया तो वह साधक भक्ति का चोर है। वह भविष्य में पुण्य रहित होकर हानि उठाता है। (गीता अध्याय 3 श्लोक 12)

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले संतजन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। भावार्थ है कि तत्वदर्शी सन्त सर्वप्रथम परम अक्षर ब्रह्म को भोग लगाकर फिर बचे हुए भोजन को सर्व भक्तों में वितरित करता है। यह पहचान है सत्य साधना की तो वह सन्त सर्व भक्ति मन्त्रा भी शास्त्रानुकूल देता है। जिस कारण से साधक सर्व पापों से मुक्त होकर सत्यलोक में चला जाता है और जो पापी लोग शास्त्राविधि अनुसार धार्मिक क्रियाऐं नहीं करते या धर्म नहीं करते, केवल अपने शरीर पोषण के लिए अन्न पकाते हैं। वे तो पाप को ही खाते हैं। (गीता अध्याय 3 श्लोक 13) अ सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अर्थात् अन्न खाने से शरीर में संतानोत्पत्ति का पदार्थ बनता है जिससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है। अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है। वर्षा शास्त्राविधि अनुसार किए गए यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान से होती है। यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान शास्त्रों में वर्णित विधि से किए जाते हैं। कर्म को ब्रह्म अर्थात् क्षर पुरूष से उत्पन्न हुए जान क्योंकि हम ब्रह्म (काल) के लोक में आए हैं तो हमको कर्म करके ही सब प्राप्त होता है। जब हम सत्यलोक में थे, तब बिना कर्म किए सब प्राप्त था। इसलिए कहा है कि कर्म को ब्रह्म (काल) से उत्पन्न जान तथा ब्रह्म (काल) की उत्पत्ति अविनाशी परमात्मा से हुई। (जिसका वर्णन गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में है तथा सृष्टि रचना अध्याय में पढे़ं।) इससे सिद्ध होता है कि (सर्वगतम् ब्रह्म) सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म सदा ही यज्ञों में अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों में (प्रतिष्ठितम्) प्रतिष्ठित है अर्थात् सब धार्मिक क्रियाओं में परम अक्षर ब्रह्म ईष्ट रूप में पूज्य है। (गीता अध्याय 3 श्लोक 14.15

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