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Bhopal

नमामि गंगे मिशन में चंबल के कछुए बने गंगा के प्राकृतिक सफाई में मददगार

रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल मध्यप्रदेश

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश सरकार जंगलों और जल स्रोतों को समृद्ध बनाकर वन्य और जलीय जीवों के संरक्षण के लिये सतत प्रयास कर रही है। विशेष रूप से साफ पानी वाली नदियों में कछुओं की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण-संवर्धन से हमारा जलीय पारिस्थिकी तंत्र सशक्त और संतुलित बनेगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रकृति और वन्यजीवों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। कछुओं का विमुक्तिकरण और चीता पुनर्वास की दिशा में बढ़ते कदम मध्यप्रदेश को वन्य-जीव पर्यटन और संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर और अधिक प्रभावी रूप से स्थापित करेंगे। उन्होंने पारिस्थितिकी तंत्र में कछुओं की महत्ता पर जोर देते हुए जल संरचनाओं के संरक्षण का आहवान किया। नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत चंबल नदी में संरक्षित दुर्लभ प्रजातियों के कछुए अब गंगा नदी की स्वच्छता और पारिस्थितिकी पुनर्जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्राकृतिक रूप से जैविक कचरे और सड़े-गले अवशेषों को खाने की क्षमता के कारण इन्हें नदी के ‘प्राकृतिक सफाई-योद्धा’ के रूप में उपयोग किया जा रहा है। परियोजना के शुभारंभ के बाद से ही चंबल में संरक्षित कछुओं को गंगा में छोड़ने का प्रयोग शुरू किया गया था। इसी क्रम में 26 अप्रैल 2025 को चंबल के संरक्षण केंद्रों से 20 दुर्लभ ‘रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल’ (बटागुर कछुये) उत्तर प्रदेश के हैदरपुर वेटलैंड और गंगा की मुख्य धारा में छोड़े गये। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्षेत्र में पाए जाने वाले बटागुर और बटागुर डोंगोका जैसे दुर्लभ कछुए गंगा की सफाई और जैव विविधता को पुनर्जीवित करने में सहायक माने जा रहे हैं। इन कछुओं को गंगा नदी के विभिन्न हिस्सों में छोड़ा जा रहा है। नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत चंबल के ये दुर्लभ कछुए अब गंगा के पुनर्जीवन अभियान के ‘जलीय योद्धा’ बनकर उभरे हैं। अपनी प्राकृतिक सफाई क्षमता के माध्यम से ये न केवल नदी की स्वच्छता में योगदान दे रहे हैं, बल्कि जलीय जैव विविधता को पुनर्जीवित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गंगा नदी के कई शहरी तटों पर बढ़ते प्रदूषण के कारण जैव विविधता संकट में है। ऐसे में कछुए जैसे जलीय जीव नदी की प्राकृतिक सफाई में अहम भूमिका निभाते हैं। मांसाहारी प्रकृति: ये कछुए नदी में मौजूद सड़े-गले जैविक पदार्थ और मृत जीवों को खाकर पानी को प्रदूषित होने से बचाते हैं। इनके कारण नदी के जलीय तंत्र में संतुलन बना रहता है, जिससे पानी की गुणवत्ता बेहतर होती है। ये कछुए ऐसे जैविक अवशेषों को भी खत्म कर देते हैं जिन्हें मशीनों से साफ करना कठिन होता है। गंगा में छोड़े गए कछुओं का जल गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव देखा गया है। जल शक्ति मंत्रालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के आकलन के अनुसार कई स्थानों पर जल गुणवत्ता में सुधार दर्ज किया गया है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और फीकल कोलीफॉर्म (FC) स्तर में कमी देखी गई है।वाराणसी के अस्सी घाट पर FC स्तर 2014 में 2500 MPN/100mL से घटकर 2025 में 790 MPN/100mL रह गया। पटना के गांधी घाट पर यह स्तर 5400 से घटकर 2200 MPN/100mL दर्ज किया गया। गंगा के अधिकांश हिस्सों में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO) स्तर अब 5.0 mg/l से अधिक है, जो जलीय जीवन के लिए अनुकूल माना जाता है हैदरपुर वेटलैंड में कछुओं की 50 प्रतिशत से अधिक जीवित रहने की दर को भी नदी के स्वास्थ्य में सुधार का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। चंबल नदी में कुल नौ दुर्लभ प्रजातियों के कछुए पाए जाते हैं। इनमें बटागुर कछुआ प्रमुख है, जो मीठे पानी में रहने वाला सर्वहारी जीव है। यह नदी में बहते वनस्पति और मृत जीवों को खाकर जल को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करता है। इसी प्रजाति का बटागुर डोंगोका ‘नदी का स्वीपर’ कहलाता है। इसके अलावा साल कछुआ, धमोक, चौड़, मोरपंखी, कटहेवा, पचेड़ा और इंडियन स्टार कछुआ जैसी दुर्लभ प्रजातियां भी चंबल में हैं।

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