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Madya Pradesh News : सरकारी शिक्षक का ‘कोचिंग मॉडल’! स्कूल में सरकारी नौकरी, बाहर निजी पढ़ाई के आरोप

शासकीय हाई स्कूल इंदुरखी में पदस्थ शिक्षक मनोज चक्र पर निजी कोचिंग चलाने का आरोप; छात्रों को कथित धमकी की शिकायत ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल

जूनियर रिपोर्टर ऋषि मोहन शिवहरे भिंड म.प्र.

रौन/भिंड। सरकारी नौकरी, सरकारी वेतन और जिम्मेदारी सरकारी स्कूल की—लेकिन आरोप है कि पढ़ाई का दूसरा ठिकाना निजी कोचिंग बन गया है। रौन क्षेत्र के शासकीय हाई स्कूल इंदुरखी में पदस्थ शिक्षक मनोज चक्र पर निजी कोचिंग संचालित कर विद्यार्थियों को पढ़ाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सरकारी सेवा में रहते हुए निजी कोचिंग चलाने का यह मामला सामने आने के बावजूद शिक्षा विभाग की कार्रवाई अब तक नजर नहीं आई है। सरकारी शिक्षक द्वारा निजी ट्यूशन/कोचिंग से जुड़े रहने के संबंध में लागू नियमों की रोशनी में मामले की जांच जरूरी है। सबसे सनसनीखेज आरोप छात्रों पर कथित दबाव का है। शिकायत के अनुसार कुछ विद्यार्थियों ने बताया कि कोचिंग नहीं लगाने पर प्रैक्टिकल में कम अंक देने तथा कक्षा 9वीं और 11वीं में फेल करने की बात कही जाती है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला केवल निजी कोचिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यार्थियों पर कथित दबाव और शैक्षणिक मूल्यांकन की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। बच्चों ने कैमरे पर बयान देने से इनकार किया, इसलिए इन आरोपों की स्वतंत्र विभागीय जांच बेहद जरूरी है।

सवाल पूछे गए तो नाम को लेकर भी उलझा मामला मामले की पड़ताल के दौरान जब पत्रकार ने शिक्षक मनोज चक्र से निजी कोचिंग के संबंध में सवाल किया तो आरोप है कि उन्होंने अपना नाम गलत बताया और पत्रकार को भ्रमित करने का प्रयास किया। यदि शिकायतकर्ता का यह आरोप सही है तो सवाल और गंभीर हो जाता है आखिर सरकारी शिक्षक को अपने पद और निजी गतिविधियों के संबंध में स्पष्ट जानकारी देने में परेशानी क्यों हुई? इसका जवाब जांच में सामने आना चाहिए। सरकारी स्कूल में पढ़ाई या निजी कोचिंग को बढ़ावा? ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का सीधा सवाल है—अगर सरकारी शिक्षक निजी कोचिंग में ही विद्यार्थियों को पढ़ाने में रुचि रखते हैं तो सरकारी स्कूल की कक्षाओं का क्या होगा? क्या सरकारी विद्यालय में भी वही मेहनत और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो रही है, जिसके लिए शिक्षक को सरकार वेतन देती है? यदि निजी कोचिंग और सरकारी स्कूल की पढ़ाई के बीच कोई अंतर है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।

शिक्षक पर आरोप से ज्यादा अब अधिकारियों की चुप्पी चर्चा में अब मामला सिर्फ शिक्षक पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल संबंधित शिक्षा अधिकारियों की भूमिका पर है। यदि निजी कोचिंग की शिकायत सामने आ चुकी है, विद्यार्थियों पर कथित दबाव के आरोप हैं और पत्रकार द्वारा भी सवाल उठाए गए हैं, तो विभागीय जांच अब तक क्यों नहीं? क्या अधिकारी शिकायत का इंतजार कर रहे हैं, या शिकायत सामने आने के बाद भी कार्रवाई के लिए किसी और घटना का इंतजार है? अब नजर भिंड कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी की ओर है कि वे मामले को संज्ञान में लेकर शिक्षक पर लगे निजी कोचिंग संचालित करने तथा विद्यार्थियों को कथित रूप से कम अंक देने और फेल करने की धमकी देने जैसे आरोपों की निष्पक्ष जांच कराते हैं या नहीं। नियम अपनी जगह, जिम्मेदारी अपनी जगह अब कार्रवाई कब? सरकारी सेवा में शिक्षक से उम्मीद होती है कि वह विद्यालय के विद्यार्थियों की पढ़ाई और उनके भविष्य को प्राथमिकता देगा। ऐसे में यदि जांच में निजी कोचिंग चलाने या विद्यार्थियों पर कोचिंग लेने के लिए दबाव बनाने के आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी तय होना चाहिए। सवाल यह भी है कि सरकारी नौकरी का लाभ लेते हुए निजी कोचिंग को बढ़ावा देने की शिकायतों पर विभाग का निगरानी तंत्र आखिर क्या कर रहा है?

रौन क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में इस मामले की निष्पक्ष जांच केवल एक शिक्षक पर लगे आरोपों की जांच नहीं होगी, बल्कि यह भी बताएगी कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की निगरानी कितनी प्रभावी है और विद्यार्थियों की शिकायतों को अधिकारी कितनी गंभीरता से लेते हैं।

अब नजर भिंड कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी पर है। क्या वे इस मामले में तत्काल निष्पक्ष जांच कराकर आरोपों की सच्चाई सामने लाएंगे? क्या यह पता लगाया जाएगा कि शिक्षक वास्तव में निजी कोचिंग चला रहे हैं, छात्रों पर किसी तरह का दबाव बनाया गया या नहीं, और सरकारी स्कूल में उनकी शैक्षणिक जिम्मेदारी का निर्वहन कैसा है? या फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर उठे ये सवाल भी फाइलों में दबकर रह जाएंगे?

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