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Uttarakhand News ये जो पानी में लकडियां नजर आ रही है , ये आज की पीढ़ी के लिए नई बात भले ही हो , लेकिन 30 से 35 साल के उपर के लोगों की यादें इसे देखकर यकीनन ताजा हो जाएगी

रिपोर्टर नारायण सिंह पिथौरागढ़ उत्तराखंड

भीमल की टहनियों से जानवरों के लिए चारा पत्तियाँ निकालने के बाद ये बलैठ से छाल निकाला जाता है और फिर छाल से रस्सियाँ बनाई जाती थी , जिसके लिए इनको खड्डे मे 2 से 3 महीने पानी में रखा जाता था और उसके बाद इसकी छाल निकाल कर रस्सियाँ बनाई जाती थी जोकि काफि मजबूत होती है इसके पीटने के बाद जो लकड़ी बच जाती है उसे आग जलाने में प्रयोग किया जाता है, जिसे केड़ा कहते हैं.

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