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Chhattisgarh News : गुरु तीजन बाई का वादा निभा रहीं RPF इंस्पेक्टर तरुणा साहू, मंच से नई पीढ़ी तक पहुंचा रहीं पंडवानी की विरासत

पुलिस सेवा के साथ लोककला का संरक्षण, छुट्टियों में मंच पर लौटकर गुरु की परंपरा को दे रही हैं नई पहचान

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़

रायपुर/जांजगीर-चांपा। छत्तीसगढ़ की विश्वविख्यात पंडवानी गायिका एवं पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई की सांस्कृतिक विरासत को उनकी शिष्या तरुणा साहू आज भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही हैं। वर्तमान में रेलवे सुरक्षा बल (RPF) में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत तरुणा साहू अपनी सरकारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ पंडवानी कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का कार्य भी निरंतर कर रही हैं। तरुणा साहू बताती हैं कि जब उन्होंने पुलिस की वर्दी पहनी थी, तब सबसे पहले अपनी गुरु तीजन बाई का आशीर्वाद लेने पहुंची थीं। उस समय गुरु ने उनसे केवल एक वादा लिया था—“पंडवानी को कभी मत छोड़ना।” तरुणा आज भी उस वचन का पूरी ईमानदारी से पालन कर रही हैं। अवकाश और साप्ताहिक छुट्टियों में वे मंच पर लौटकर पंडवानी की प्रस्तुति देती हैं और नई पीढ़ी को इस लोककला का प्रशिक्षण भी देती हैं।

तरुणा साहू की पंडवानी यात्रा महज 10 वर्ष की आयु में शुरू हुई। छात्रावास में पढ़ाई के दौरान उनके संगीत शिक्षक ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। लगभग 100 बच्चों में से केवल 10 बच्चों को गुरु तीजन बाई के साथ प्रस्तुति देने का अवसर मिला, जिनमें तरुणा भी शामिल थीं। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर लगभग 16 वर्षों की गुरु-शिष्य परंपरा में बदल गई। तरुणा साहू ने स्थायी भविष्य के लिए पुलिस सेवा को चुना, लेकिन अपनी लोककला को कभी नहीं छोड़ा। आज वे RPF इंस्पेक्टर के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ पंडवानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं।

उनका मानना है कि पंडवानी केवल एक गायन शैली नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और लोकपरंपरा का जीवंत स्वरूप है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। वे आधुनिक विजुअल स्टोरीटेलिंग के माध्यम से युवाओं को पंडवानी से जोड़ने का भी प्रयास कर रही हैं। छत्तीसगढ़ में दुर्गा साहू, रितु वर्मा, पूजा दीवान, आराध्या साहू सहित अनेक कलाकार गुरु तीजन बाई की शिष्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सभी कलाकार अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए देश-विदेश में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को नई पहचान दिला रहे हैं। स्थानीय कला प्रेमियों का कहना है कि जब भी गुरु तीजन बाई मंच पर प्रस्तुति देती थीं, हजारों-लाखों लोग उनकी कला के साक्षी बनने पहुंचते थे। आज उनकी शिष्याएं उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पंडवानी को जीवंत बनाए हुए हैं।

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