
रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल मध्यप्रदेश
फ़ोन से निकलने वाला रेडिएशन 5 साल के बच्चे के दिमाग में लगभग पूरी तरह से अंदर तक पहुँच सकता है। एक कोरियाई पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा दशकों की रिसर्च की समीक्षा इन नतीजों तक पहुँची है। ये आँकड़े बिल्कुल भी हल्के नहीं हैं। 5 साल के बच्चे की खोपड़ी वयस्क 2 मिमी 10 साल 1 मिमी 5 साल 0.5 मिमी यानी वयस्क के मुकाबले लगभग एक चौथाई पतली होती है।इसका मतलब फोन से निकलने वाली विकिरण लगभग सीधे मस्तिष्क तक पहुँच सकती है। लेकिन खोपड़ी सिर्फ आधी कहानी है।बच्चों के दिमाग में ज़्यादा नमी और आयनिक तत्व होते हैं। समान एक्सपोज़र पर भी ज़्यादा ऊर्जा अवशोषण गहरा प्रभाव शोध कहता है।1,928 बच्चे — ल्यूकेमिया 956 बच्चे — मस्तिष्क ट्यूमर रेडियो ट्रांसमीटर के 2 KM के अंदर रहने वाले बच्चों में 2.15 गुना ज़्यादा जोखिम 20 KM से दूर रहने वालों के मुकाबले और सबसे चौंकाने वाली बात ये सब उस समय की बात है। जब स्मार्टफोन नहीं थे।हर घर में WiFi नहीं था हर क्लास में टैबलेट नहीं था।आज की हकीकत होमवर्क टैबलेट मनोरंजन फोन स्कूल WiFi रात भर राउटर चालू हर सेकंड एक्सपोज़र हर दिन बढ़ता संपर्क और इसी समय बच्चे के दिमाग में हर सेकंड लाखों न्यूरल कनेक्शन बन रहे हैं।जीवन का सबसे संवेदनशील विकासात्मक चरण सोचिए क्या हम अनजाने मे बच्चों को अदृश्य तरंगों के बीच बड़ा कर रहे हैं? क्या ये सिर्फ सुविधा है या एक धीमा, अनदेखा जोखिम? सोते समय फोन दूर रखें WiFi रात में बंद करें बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करें कॉल के लिए स्पीकर ईयरफोन का उपयोग करें बिना टेक हटाए भी 80% तक एक्सपोज़र कम किया जा सकता है ।अदृश्य तरंगें दिखाई नहीं देतीं लेकिन उनका असर महसूस हो सकता है। सावधानी रखें वे अभिभावकों जिनके घर में छोटे बच्चे हैं।




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