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*आज मेरी कलम के माध्यम से पूरे भारत में पुलिस की सेवा दे रहे उनके हक के लिए हमने अपने न्यूज के माध्यम से लिखा है*

*वर्दी के पीछे का दर्द पुलिस को सब बहुत बोलते हैं पर कभी उनकी जगह रहकर 1घण्टे देखिए तब समझ में आए*

✍️*वर्दी के पीछे छुपा दर्द—हर मौसम में, हर पल*
— ✍️*मेरी कलम से: निखिलेश कुमार मिश्रा*
*इंडियन क्राइम न्यूज | भ्रष्टाचार विरोधी रिपोर्टर | RPSS जिला अध्यक्ष, वाराणसी, उत्तर प्रदेश*
बनारस की तंग गलियों से लेकर इस देश के कोने-कोने में बसे हर थाने तक
जब जाड़े में कड़ाके की ठंड पड़ती है, कोहरा इतना घना होता है कि दो कदम आगे नहीं दिखता, हम-आप गर्म रजाइयों में दुबके होते हैं — तब कोई उसी हाड़ कँपा देने वाली ठंड में चौराहे पर काँपते हुए पहरा दे रहा होता है।
जब गर्मी में लू के थपेड़े चेहरा झुलसाते हैं, पारा 45 डिग्री पार कर जाता है, हम-आप AC और कूलर में बैठे होते हैं — तब कोई उसी धधकती दोपहर में तपती सड़क पर खड़ा होता है, जहाँ जूते के तले पिघलने लगते हैं।
जब बरसात में मूसलाधार बारिश होती है, आँधी-तूफान आता है, हम-आप घर की छत के नीचे चाय की चुस्की लेते हैं — तब कोई उसी तेज़ बारिश में भीगते हुए, कीचड़ में चलते हुए, बाढ़ के पानी में घुसकर लोगों को बचा रहा होता है।
वो है — खाकी वर्दी वाला।
न जाड़ा उसे घर जाने देता है, न गर्मी, न बरसात। हर मौसम उसकी परीक्षा लेता है — और वो हर बार डटा रहता है। लेकिन अफसोस, उसका यह दर्द न अखबार की सुर्खियाँ बनता है, न नेता उसकी तकलीफ पर भाषण देते हैं, न सोशल मीडिया पर उसके लिए कोई ट्रेंड चलता है।
पुलिस सबके लिए सोचती है — पर पुलिस के लिए कौन सोचता है?
कागजों में 8 घंटे की शिफ्ट लिखी है, लेकिन हकीकत में 14 से 16 घंटे की खटाई आम बात है।
जाड़े में — रात की गश्त का मतलब है घंटों उस कँपकँपाती ठंड में पैदल चलते रहो। अलाव के लिए लकड़ी खुद जुगाड़ करो। गर्म जैकेट, दस्ताने, ऊनी मोजे — सरकार नहीं देती, खुद खरीदो।
गर्मी में — दोपहर की ड्यूटी का मतलब है उस झुलसाती धूप में घंटों खड़े रहो जहाँ छाँव नहीं, पानी नहीं, बैठने की जगह नहीं। लू लगे तो भी ड्यूटी नहीं छूटती। VIP काफिला गुजरना है तो चाहे पारा कितना भी हो — वर्दी वाला सड़क पर खड़ा रहेगा।
बरसात में — बाढ़ आई, तूफान आया, शहर डूब रहा है — तब सबसे पहले खाकी वाला ही उतरता है पानी में। कमर तक पानी, ऊपर से मूसलाधार बारिश, और जिम्मेदारी है लोगों को सुरक्षित निकालने की। खुद भीगे, खुद बीमार पड़े — फर्क नहीं पड़ता, ड्यूटी पहले।
न वीकली ऑफ पक्का, न छुट्टी की गारंटी, न ओवरटाइम का पैसा — बारह महीने, तीनों मौसम।
छुट्टी माँगना भी सजा है
एक आम सरकारी कर्मचारी को छुट्टी चाहिए तो एक एप्लीकेशन काफी। लेकिन पुलिसकर्मी को CL चाहिए तो पहले CO साहब, फिर SO, फिर इंस्पेक्टर — चक्कर के ऊपर चक्कर।
दिवाली की ठंडी रात में घर में अँगीठी जलानी है — पर वर्दी वाला चौराहे पर ठिठुर रहा है।
होली की गर्मी में बच्चों संग रंग खेलना है — पर वर्दी वाला भीड़ सँभाल रहा है।
सावन की बरसात में घर में बैठकर पकोड़े खाने हैं — पर वर्दी वाला जलभराव में फँसे लोगों को निकाल रहा है।
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ानी है — पर वर्दी वाला कोहरे में गश्त पर है।
बीमार माँ को देखने जाना है — पर “साहब अभी फोर्स कम है” सुनने को मिलता है।
रात भर गश्त, सुबह कोर्ट की पेशी, दिन में विवेचना, और बीच-बीच में साहब की बेगारी — यही है एक पुलिसकर्मी का दिन — जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात।
परिवार — जो सिर्फ इंतजार करता है
जाड़े की रात में बच्चे पूछते हैं — “पापा, बाहर बहुत ठंड है, आप ठीक हो?”
गर्मी की दोपहर में पत्नी फोन करती है — “खाना खाया? पानी पी रहे हो?”
बरसात की रात में माँ दुआ करती है — “भगवान मेरे बेटे को सलामत रखना।”
और वर्दी वाला हर बार हँसकर कह देता है — “सब ठीक है।” — जबकि वो जानता है कि ठीक कुछ नहीं है।
बच्चे का स्कूल का फंक्शन था — पापा नहीं आए।
माँ का जन्मदिन था — बेटा ड्यूटी पर था।
पत्नी बीमार थी — पति VIP की सुरक्षा में था।
यह कोई एक घर की कहानी नहीं — यह हर थाने की, हर चौकी की, हर उस वर्दी की कहानी है जो बारह महीने, तीनों मौसम देश की सेवा में अपना घर बिसार चुकी है।
जेब से नौकरी — सेहत से समझौता
किसी चौकी क्षेत्र में लावारिस लाश मिली? क्रिया-कर्म का खर्च चौकी इंचार्ज की जेब से। मुलजिम पकड़ने मुंबई या चेन्नई जाना पड़े — टिकट, होटल, खाने का खर्च IO की तनख्वाह से। TA/DA साल भर बाद, वो भी आधा-अधूरा।
जाड़े में — थाने की खिड़कियों से बर्फीली हवा आती है, शीशे टूटे हैं, हीटर नहीं — फंड नहीं। रात की गश्त के लिए गर्म कपड़े — खुद खरीदो।
गर्मी में — थाने में पंखा टूटा है, AC तो सपने की बात है, पीने का ठंडा पानी भी नहीं — फंड नहीं। धूप में ड्यूटी के लिए छाता या टोपी — खुद का इंतजाम करो।
बरसात में — थाने की छत टपकती है, आँगन में पानी भरता है, रेनकोट सरकार नहीं देती — खुद खरीदो।
वर्दी साल में दो जोड़ी मिलती है — बाकी सब तीनों मौसम के लिए खुद की तनख्वाह से।
नतीजा — 30% से ज्यादा पुलिसकर्मी ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीज हैं। जाड़े में जोड़ों का दर्द और साँस की बीमारी। गर्मी में लू और डिहाइड्रेशन। बरसात में बुखार और डेंगू। नींद 4 घंटे, खाना सड़क किनारे ठेले पर — तीनों मौसम में। हजारों जवान डिप्रेशन और बर्नआउट से जूझ रहे हैं।
बदले में क्या मिलता है?
गलती हो तो — सस्पेंशन।
सही काम करो तो — तारीफ भी ठीक से नहीं।
जनता मुश्किल में सबसे पहले 112 डायल करती है। जाड़े में आधी रात को भी, गर्मी की तेज़ धूप में भी, बरसात के तूफान में भी। और काम निकल जाने के बाद उसी पुलिस को कटघरे में खड़ा कर देती है।
“दरोगा के दर्द को सिर्फ दरोगा ही समझ सकता है” — यह लाइन हर थाने की दीवार पर लिखी होनी चाहिए।
अब वक्त है — सोच बदलने का
पुलिस हमारी सुरक्षा की पहली लाइन है। अगर यही पहली लाइन — ठिठुरती हुई, झुलसती हुई, भीगती हुई, टूटी हुई और हताश होगी — तो समाज महफूज कैसे रहेगा?
मैं, निखिलेश कुमार मिश्रा, एक भ्रष्टाचार विरोधी रिपोर्टर और RPSS जिला अध्यक्ष वाराणसी के रूप में यह माँग रखता हूँ —1. भर्ती बढ़े — स्टाफ पूरा होगा तो 8 घंटे ड्यूटी और समय पर छुट्टी का सपना पूरा होगा।2. लीव पॉलिसी पारदर्शी हो — CL-EL के लिए सिंगल विंडो सिस्टम हो। त्योहार पर रोटेशन से छुट्टी मिले।3. मौसम के अनुसार सुविधाएँ मिलें जाड़े में गर्म जैकेट, दस्ताने, ऊनी मोजे और अलाव की व्यवस्था सरकार करे।
गर्मी में छाँव, ठंडा पानी, ORS और हीट स्ट्रोक से बचाव की व्यवस्था हो।
बरसात में अच्छी क्वालिटी का रेनकोट, वाटरप्रूफ जूते और बाढ़ राहत उपकरण मिलें।
यह उनका हक है — भीख नहीं।

4. फंड समय पर और पूरा मिले — विवेचना खर्च, थाने का रखरखाव — पुलिसकर्मी की जेब पर बोझ न पड़े।

5. सेहत पर ध्यान दिया जाए — हर थाने में नियमित मेडिकल चेकअप, योग और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग अनिवार्य हो। 6. सम्मान मिले जाड़े की रात में गश्त कर रहे सिपाही को एक कप गर्म चाय पिलाइए।
गर्मी की दोपहर में ड्यूटी पर खड़े जवान को एक गिलास ठंडा पानी दीजिए।
बरसात में भीगते पुलिसकर्मी से एक बार “ठीक हो भाई साहब?” पूछ लीजिए।
वर्दी वाले का पूरा दिन बदल जाएगा।
अंत में…
वर्दी की इज्जत तभी मुकम्मल होगी — जब वर्दी पहनने वाले इंसान की इज्जत होगी।
कभी जाड़े की काली रात में बाहर झाँकिएगा — कोई ठिठुरता हुआ खाकी में खड़ा मिलेगा।
कभी गर्मी की दोपहर में बाहर देखिएगा — कोई झुलसती धूप में डटा हुआ मिलेगा।
कभी बरसात के तूफान में खिड़की से झाँकिएगा — कोई भीगता हुआ पहरा देता मिलेगा।
उसकी आँखों में झाँकिएगा — वहाँ नींद नहीं, फिक्र तैरती मिलेगी। आपकी, हमारी, पूरे समाज की।
जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात — वो जागता रहता है, इसीलिए हम चैन से सो पाते हैं।
फिर भी समाज उसे हर घटना का दोषी मान लेता है —
यह कहाँ का न्याय है?
*निखिलेश कुमार मिश्रा*
*इंडियन क्राइम न्यूज  भ्रष्टाचार विरोधी रिपोर्टर*
*RPSS जिला अध्यक्ष, वाराणसी, उत्तर प्रदेश*

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