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Haryana News जो भक्त भगवान की नि:स्वार्थ भक्ति करता है, भगवान उस पर स्वयं न्यौछावर हो जाते हैं-आचार्य बजरंग शास्त्री

रिपोर्टर सतीश नारनौल हरियाण 

नारनौल के समीप गांव खटोंटी खुर्द में आयोजित संगीतमय श्री मदभागवत कथा के सप्तम दिवस पर आज सर्वप्रथम मनीष शास्त्री ने मुख्य यजमान कमलकांत शर्मा, मनीष भारद्वाज के द्वारा विधिविधान से सभी देवताओं का पूजन करवाया और भागवत कथा का शुभारंभ करवाया। इसके उपरांत आचार्य बजरंग शास्त्री जी ने भागवत कथा का प्रवचन देते हुये बताया कि भगवान भक्तो के भाव को देखते है भाव के बिना वो किसी भी वस्तु को ग्रहण नही करते ।भगवान कहते है की मैं भाव का भूखा हूँ। मै और भाव ही एक सार है। भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है। आचार्य जी ने गोपी उद्धव सम्वाद का मार्मिक वर्णन करते हुये कहा कि गोपीयों का प्रेम संसारिक प्रेम नही था, ये तो भक्त और भगवान का प्रेम था ।उन्होने बताया कि मनुष्य को निस्वार्थ भक्ति करनी चाहिये भक्ति के बदले हमारे मन मे किसी वस्तु की माँगने की कामना नही होनी चाहिये । भगवान को नि स्वार्थ भक्ति पसंद है । जो भक्त नि स्वार्थ भक्ति करता है भगवान उस पर स्वयं न्यौछावर हो जाते है । क्योंकि भगवान कहते है “निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र ना भावा”। भक्तो के जीवन मे ज्ञान का महत्व कम है जबकि भक्ति को सर्वोपरि माना है।
उद्धव जैसे ज्ञानी को गोपियों ने अपनी भक्ति और प्रेम से अपना भक्त बना लिया था।आचार्य जी ने कहा कि हमे धर्म कर्म मे रुचि लेकर भगवान को सुमिरन करते रहना चाहिये । हमारे अच्छे कर्म और भगवान का नाम ही हमे मुसीबतों से बचाता है ।विश्राम दिवस कि कथा मे आचार्य जी ने कृष्ण भगवान के 16108 विवाह का भी वर्णन किया। व्यास जी ने कृष्ण सुदामा चरित्र का बड़ा ही मार्मिक वर्णन करते हुये कहा कि “देख सुदामा की दीन दशा ,करुणा करके करुणानिधि रोये । पानी परात को हाथ छुयो नही नैनन के जल सो पग धोये “,सुनकर सभी भक्तो के नेत्र सजल हो गये। उन्होने बताया की सुदामा के लिये जितने विशेषण भागवत मे बताएं गये है, शायद ही किसी के लिये उनका प्रयोग किया गया हो। सुदामा जी एक तपोनिष्ठ और ब्रह्म को जानने वाले ब्राह्मण थे। उन्होने बताया कि जैसी मित्रता कृष्ण और सुदामा जी ने निभाई वैसी ही हमे भी मित्रता निभानी चाहिये। आचार्य जी ने बताया की हमे जीवन मे कभी भी संतों का , गुरुजनों का ब्राह्मणों का कभी हमे अपमान नही करना चाहिये, बल्कि उनका तो आशीर्वाद लेना चाहिये। भगवान भी कृष्ण भी अपने पुत्रों को यही उपदेश करते थे।

एक बार पुत्रों ने मिलकर संतों का अपमान किया, जिसके कारण संतों के श्राप से भगवान के यदुकुल का संहार हुआ और प्रभु श्री कृष्ण अपनी लीला को पूर्ण करके और उद्धव को ज्ञान उपदेश करके परम धाम को प्रस्थान कर गये । कथा के अंत मे दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं की कथा और कलियुग के प्रभाव का वर्णन किया । उन्होने बताया कि कलियुग मे बहुत अत्याचार होगा ,संतों ,ब्राह्मणो का अपमान होगा माता पिता का तिरस्कार होगा ।कलियुग मे सभी पापों से बचने का एकमात्र उपाय हरी नाम सँकिर्तन है । इसलिए हमे सदा भगवान के नाम का स्मरण करते रहना चाहिये । उसके बाद भागवत जी की और शुकदेव जी की विदाई हुई की गई। रमेश शर्मा एवं महेश भालोठिया एवं सतीश शर्मा व्यास पीठ पर आसीन महाराज जी क़ो पगड़ी दुपट्टा पहनाकर सम्मानित किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया तथा कथा के अंत मे वृंदावन की प्रसिद्ध फूलों की होली खेली गयी। जिसमे सुंदर झांकी भी दिखाई गयी। जिसमें सभी भक्तो ने झुमकर नाच कर आनँद लिया। इस अवसर पर मुख्य रूप से महावीर शर्मा ,सतीश शर्मा ,रतन शर्मा ,प्रहलाद सोनी , प्रदीप संघी , पिंकी शर्मा, अन्नु , संगीता, कृष्णा, पूजा, सपना , प्रवीण , नवीन, कमल , मनीष, अनिल शर्मा और पूनम शर्मा सहित सैकडों की संख्या में मातायें बहने एवं काफी संख्या में गांव के अनेक गणमान्य लोग मुख्य रूप से मौजूद रहे।

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