राज्यस्तरीय कार्यशाला में शामिल हुआ सेजेस करंजी के प्राचार्य विश्व मोहन मिश्रा का आलेख

बस्तर की पहचान केवल उसके जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक सौंदर्य में नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक-संस्कृति, परंपराओं और पंडुमों में भी रची-बसी है। इसी विरासत को शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में सेजेस करंजी के प्राचार्य श्री विश्व मोहन मिश्रा का आलेख ‘बस्तर के पंडुम’ महत्वपूर्ण उपलब्धि बनकर सामने आया है। रायपुर में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशाला में इस आलेख को शामिल किया गया है। आलेख में बस्तर के पारंपरिक तीज-त्योहारों को कृषि, प्रकृति, पशुधन, स्थानीय देवी-देवताओं और सामुदायिक जीवन से जोड़कर उनके सांस्कृतिक महत्व को प्रस्तुत किया गया है। बस्तर दशहरा, गोंचा, माटी तिहार, नवाखाई, दियारी, छेरछेरा सहित विभिन्न पंडुमों के माध्यम से बस्तर की जीवनशैली और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को सामने रखा गया है। इस उपलब्धि पर बस्तर कलेक्टर आकाश छिकारा ने प्राचार्य विश्व मोहन मिश्रा को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बस्तर की विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं को लेखन के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना सराहनीय प्रयास है। ऐसे प्रयास बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ उसकी पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने में सहायक होंगे। जिला शिक्षा अधिकारी बलिराम बघेल ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बस्तर के पंडुमों और लोक परंपराओं को शिक्षा से जोड़ना विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि ‘बस्तर के पंडुम’ जैसे प्रयास बच्चों को अपनी संस्कृति को जानने और समझने का अवसर देंगे तथा बस्तर की विशिष्ट पहचान को मजबूत करेंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग के माध्यम से स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और लोक ज्ञान को विद्यार्थियों तक पहुंचाने से नई पीढ़ी अपनी विरासत पर गर्व करना सीखेगी और ‘नया बस्तर’ अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ेगा। ’नया बस्तर’ में विकास के साथ विरासत भी ‘बस्तर के पंडुम’ ‘नया बस्तर’ की उस सोच को मजबूती देता है, जिसमें विकास और आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजना भी जरूरी है। बस्तर आगे बढ़े, आधुनिक बने, लेकिन उसके पंडुम, लोक परंपराएं, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन की भावना आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहे—यही बस्तर की वास्तविक पहचान है।

प्राचार्य विश्व मोहन मिश्रा ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “माई जी की कृपा रही तो आगामी वर्षों में छत्तीसगढ़ के बच्चे बस्तर के तीज-त्योहारों के विषय में जान सकेंगे।” उन्होंने कहा कि बस्तर के पंडुम केवल त्योहार नहीं, बल्कि यहां के जीवन, प्रकृति, कृषि और सामुदायिक संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने आलेख तैयार करने में विशेष सहयोग के लिए सेजेस करंजी के लाइब्रेरियन श्री जय बंजारे का विशेष रूप से आभार व्यक्त किया। साथ ही आलेख का ड्राफ्ट तैयार करने में सहयोग के लिए अपनी धर्मपत्नी श्रीमती इंदिरा विश्व मोहन मिश्रा के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त की। राज्यस्तरीय कार्यशाला में ‘बस्तर के पंडुम’ का शामिल होना केवल एक आलेख की उपलब्धि नहीं, बल्कि बस्तर की लोक-संस्कृति को शिक्षा के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। बस्तर बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है और ‘नया बस्तर’ आकार ले रहा है—लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी संस्कृति है। बस्तर के पंडुम इसी संस्कृति की जीवंत पहचान हैं। शिक्षा के माध्यम से इन्हें सहेजकर विद्यार्थियों तक पहुंचाना बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने की सार्थक पहल है।



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