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जिन आदिवासियों की आस्था से सजता है ऐतिहासिक दशहरा, आज उन्हीं के सम्मान का 80 लाख के ‘मीना बाज़ार’ में हो रहा सौदा

बस्तर के विश्वप्रसिद्ध और ऐतिहासिक दशहरे की प्रथम रस्म ‘पाट जात्रा’ के पावन अवसर पर समस्त बस्तरवासियों और अंचल के दूर-दराज गांवों से आने वाले हमारे आदिवासी भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ। बस्तर दशहरा केवल एक शासकीय उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी माटी की आस्था, संस्कृति और यहाँ के मूल निवासियों की प्राणवायु है। लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और हृदयविदारक है कि जिस आदिवासी समुदाय के खून-पसीने और अटूट आस्था के बिना इस 75 दिनों के महाकुंभ की कल्पना भी नहीं की जा सकती, आज व्यवस्थापकों, सत्ताधीशों और राजपरिवार ने उसी समुदाय को दर-दर भटकने के लिए सड़क पर छोड़ दिया है। विकास के नाम पर छिन गए पारंपरिक आश्रय स्थल, पूर्व के वर्षों में अंचल से आने वाले हमारे ग्रामीणों के विश्राम हेतु बस्तर हाई स्कूल, राष्ट्रीय विद्यालय, सदर स्कूल, और पुराना PWD कार्यालय (वर्तमान बस्तर आर्ट गैलरी) जैसे स्थानों पर मुकम्मल व्यवस्था होती थी। परंतु आज प्रशासन ने इन स्थलों का पूरी तरह ‘व्यवसायीकरण’ कर दिया है। पूर्व के आश्रय स्थल (तहसील कार्यालय) को ‘बियांड टैंपटेशन’ नामक निजी संस्था को सौंपकर, संस्कृति के नाम पर कैफे-संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, जो ‘आदिवासी भवन’ सीधे तौर पर आदिवासियों के हक़ का था, वह वर्षों से प्रशासन की अकर्मण्यता के चलते निर्माणाधीन पड़ा धूल फांक रहा है,बस्तर संभाग के समस्त जनप्रतिनिधि विश्व आदिवासी दिवस पर सज धज कर फोटो खिंचवाते है, फ्लेक्स लगवाते है पर आदिवासियों के लिए भवन निर्माण के फंड की व्यवस्था की आती है तो कोई पहल नहीं करना चाहता। मीलों पैदल चलकर बस्तर दशहरे की रस्में निभाने वाले हमारे आदिवासी भाई-बहन आखिर कहाँ ठहरेंगे? क्या प्रशासन, नेता और राजपरिवार चाहते हैं कि वे निजी कैफे के बाहर या मीना बाज़ार के तंबुओं के पीछे सड़कों पर रात गुजारें?

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जिस ऐतिहासिक दशहरे की नींव आदिवासी आस्था और राजपरिवार के संबंधों पर टिकी है, आज उसी राजपरिवार की व्यावसायिक सोच ने बस्तर को शर्मसार किया है। जिन भोले-भाले आदिवासियों के असीम सम्मान और निस्वार्थ सेवा से राजपरिवार का सदियों पुराना गौरव आज भी जीवित है, उनके रुकने के लिए राजमहल परिसर में जगह देने के बजाय, उस पावन भूमि को 70 से 80 लाख रुपये के भारी-भरकम किराये की लालच में ‘मीना बाजार’ (डिज़्नी लैंड) के संचालकों को सौंप दिया जाता है। आदिवासियों की पीढ़ियों की आस्था को महज़ चंद रुपयों के मुनाफे की वेदी पर चढ़ा देना, राजपरिवार की चरम संवेदनहीनता का ज्वलंत प्रमाण है। सांसद, मंत्री, विधायक और अफ़सरों का शर्मनाक मौन

यह बस्तर की सबसे बड़ी विडंबना है कि यहाँ का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे सांसद, मंत्री और विधायक, जो इसी आदिवासी समाज के वोटों की सीढ़ी चढ़कर सत्ता के वातानुकूलित कमरों तक पहुँचे हैं, आज पूरी तरह गूंगे और बहरे हो चुके हैं। चुनाव के समय यही नेता आदिवासियों के सबसे बड़े रहनुमा होने का स्वांग रचते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही अपनी प्राथमिकता भूल जाते हैं। क्या हमारे मंत्रियों और विधायकों का काम केवल ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देना और अपनी जेबें भरना रह गया है? बस्तर के आदिवासियों के हक में आवाज़ उठाने के लिए इनके मुंह क्यों सिल गए हैं? ज़िले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर कागजी बैठकों और ‘फोटो-ऑप’ की औपचारिकता निभा रहे हैं। धरातल पर आदिवासियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। हम बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष , ज़िले के आला अधिकारियों, स्थानीय विधायकों, मंत्रियों, सांसद और राजपरिवार से यह दृढ़ मांग करते हैं:
1. तत्काल और सम्मानजनक व्यवस्था: दशहरा में आने वाले सभी ग्रामीणों के लिए समय रहते सुरक्षित, व्यवस्थित और पूर्णतः निःशुल्क ठहरने की सम्मानजनक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
2. परंपराओं का बाज़ारीकरण बंद हो: राजमहल परिसर और अन्य पारंपरिक स्थलों को व्यावसायिक मुनाफे (मीना बाज़ार आदि) के बजाय बस्तर के मूल निवासियों की सुविधा के लिए प्राथमिकता के आधार पर आरक्षित किया जाए।
हमारे बस्तर की असली पहचान उसकी आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से है, मीना बाज़ार के शोर और कैफे की चमक से नहीं। आदिवासियों के लिए उचित व्यवस्था करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि इस माटी का कर्ज है।

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