Chhattisgarh News : आखिर क्यों बैठाया गया रवि भगत को थाने में? थाना प्रभारी कह रहे ‘मीटिंग में बिजी हैं’, आखिर कौन सी मीटिंग… कौन देगा जवाब?…

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
रायगढ़। जिले के शासकीय हाई स्कूल कुपाकानी में सरस्वती साइकिल योजना के तहत बालिकाओं को साइकिल वितरण के दौरान उस समय भारी हंगामा मच गया, जब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नेताओं ने बांटी जा रही साइकिलों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े किए। वीडियो फुटेज और बयानों से स्पष्ट होता है कि बांटी जा रही साइकिलें अत्यंत घटिया गुणवत्ता (थर्ड क्लास क्वालिटी) की थीं: साइकिल की हालत: साइकिलों के न तो ब्रेक ठीक थे, न घंटी, और न ही कोई सुदृढ़ गुणवत्ता। अलग-अलग कंपनियों के स्टीकर और टेप चिपकाकर उन्हें नया रूप देने की कोशिश की गई थी। रसीद व बिल नदारद: जब नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने साइकिल का बिल, रसीद या वारंटी कार्ड मांगा, तो स्कूल प्रबंधन और संबंधित अधिकारी कोई जवाब नहीं दे सके। सीधे सवाल: वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि रवि भगत और अन्य नेता अधिकारियों से तीखे सवाल कर रहे हैं-
“क्वालिटी पूर्ण है क्या? आप अपने मुंह से कहिए! छत्तीसगढ़ शासन जो दे रहा है, क्या बच्चों को घटिया साइकिल बांटेंगे? छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री हैं, और छत्तीसगढ़ की आदिवासी बेटियों को घटिया साइकिल वितरण किया जा रहा है… इसका जवाब कौन देगा?” सुशासन के दावों पर कड़ा प्रहार :एक तरफ विष्णु देव साय सरकार के सुशासन के दावे किए जाते हैं, वहीं धरातल पर गरीब और आदिवासी परिवारों की बेटियों को शिक्षा के नाम पर घटिया और कबाड़ साइकिलें थमाई जा रही हैं। जब इसका विरोध किया गया और भ्रष्टाचार की पोल खुली, तो अधिकारियों द्वारा लीपापोती की जाने लगी।

अनसुलझे और ज्वलनशील सवाल:
थाने में क्यों बैठाया गया? जब जनप्रतिनिधियों ने बालिकाओं के हक की आवाज उठाई, तो रवि भगत को थाने में क्यों बैठाया गया? मीटिंग का बहाना क्यों? जब इस बाबत थाना प्रभारी से जवाब मांगा गया, तो उनका यह कहना कि “वे मीटिंग में व्यस्त हैं”- आखिर किस बड़ी लापरवाही या राजनीतिक दबाव पर पर्दा डालने का प्रयास है? भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन? इस घटिया क्वालिटी की साइकिल खरीदी और वितरण के इस खेल में मलाई खाने वाले असली गुनहगार कौन हैं?
यह रिपोर्ट प्रशासनिक लापरवाही, सुशासन के खोखले दावों और आदिवासी बेटियों के अधिकारों के हनन का एक जीता-जागता दस्तावेज है। जनता और पीड़ित परिवार अब सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं-“आखिर इस सबका जवाब कौन देगा?”

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