Uttar Pradesh News : कर्बला के संदेश को दुनिया तक पहुंचाने में हज़रत ज़ैनब की ऐतिहासिक भूमिका-मौलाना सलमान
रिपोर्टर नौरोज़ हैदर बिजनौर उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश जनपद बिजनौर के हल्दौर क्षेत्र के गांव छजुपुरा सादात में अशरा ए चेहलुम हज़रत इमाम हुसैन के उनवान से आयोजित होने वाली दस दिवसीय मजलिसों के तीसरे दिन की पहली मजलिस दरगाहे फातेमा में तथा दूसरी मजलिस इमाम बारगाह में आयोजित हुई मजलिसों को क्रमशः मौलाना सय्यद हैदर रज़ा नजफ़ी व मौलाना सलमान अब्बास बाराबंकी ने सम्बोधित किया
मिडिया प्रभारी शाही वास्ती के संचालन में आयोजित मजलिसों में मरसिया खानी मौहम्मद रज़ा, मौहम्मद अब्बास, नायाब हैदर, मौहम्मद आलम, सालिम ज़ैदी ने पेशखानी मौलाना मैहदी अब्बास ज़ैदी व रईस ज़ैदी ने की तथा नोहे खानी यासिर ज़ैदी, अरमान अली व अम्मार ज़ैदी ने की
मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना सलमान अब्बास ने कहा की कर्बला में इमाम हुसैन (अ) ने अपनी शहादत देकर इस्लाम की रक्षा की, जबकि हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने साहस और प्रभावशाली ख़ुत्बों (भाषणों) के माध्यम से उस कुर्बानी के संदेश को पूरी दुनिया तक पहुंचाया।

आम तौर पर माना जाता है कि कर्बला की घटना 10 मुहर्रम को समाप्त हो गई, लेकिन वास्तव में आशूरा इस संघर्ष का केवल एक चरण था। कर्बला में तलवार से जो लड़ाई लड़ी गई, उसके बाद कूफ़ा और शाम में सच को लोगों तक पहुंचाने का काम हज़रत ज़ैनब (स) ने किया। आशूरा के बाद दुश्मनों को लगा कि इमाम हुसैन (अ) की शहादत के साथ सत्य की आवाज़ भी दब जाएगी, लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि हज़रत ज़ैनब (स) अभी जीवित हैं। उन्होंने अपने धैर्य, हिम्मत और बुद्धिमत्ता से हालात का सामना किया।

जब अहले-बैत के क़ैदियों को कूफ़ा लाया गया, तो बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने के लिए इकट्ठा हुए। उस समय हज़रत ज़ैनब (स) ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन लोगों ने इमाम हुसैन (अ) को बुलाया, वही उन्हें मुश्किल वक्त में अकेला छोड़ गए। उनके इन शब्दों ने कूफ़ा के लोगों के दिलों को झकझोर दिया और उन्हें अपनी गलती का एहसास कराया। इसके बाद क़ैदियों के काफ़िले को शाम में यज़ीद के दरबार में पेश किया गया। यज़ीद अपनी जीत पर खुश था, लेकिन हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने ऐतिहासिक भाषण से उसकी जीत के घमंड को तोड़ दिया। उन्होंने यज़ीद को चुनौती देते हुए कहा कि वह चाहे जितनी कोशिश कर ले, लेकिन अहले-बैत का नाम और अल्लाह का संदेश कभी मिटाया नहीं जा सकता। उनके इन शब्दों ने यह स्पष्ट कर दिया कि कर्बला की कुर्बानी किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और इंसाफ़ की हमेशा जीवित रहने वाली आवाज़ है।

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