Jharkhand News : चतरा: तोलोलिंग विजय- वो निर्णायक मोड़ जिसने कारगिल युद्ध की बदल दी दिशा
दो राजपूताना राइफल्स के अदम्य साहस की गाथा, 56 जवानों ने दी शहादत

रिपोर्टर महेंद्र कुमार यादव चतरा झारखंड
चतरा। कारगिल युद्ध के इतिहास में “तोलोलिंग” का नाम सबसे कठिन और रक्तरंजित युद्धक्षेत्रों में दर्ज है। यही वो पथरीली चोटी थी जिसने भारतीय सेना को सबसे ज्यादा चुनौती दी, लेकिन यहीं से युद्ध की दिशा भी बदली। पूर्व सैनिक हनी कैप्टन दिलीप कुमार सिंह, सेवानिवृत ने तोलोलिंग युद्ध की यादों को साझा करते हुए बताया कि कैसे 2 राजपूताना राइफल्स के जवानों ने अपने अदम्य साहस से दुश्मन के मजबूत ठिकानों को ध्वस्त कर तिरंगा फहराया। कारगिल युद्ध के शुरुआती चरण में 18 ग्रेनेडियर्स और 16 ग्रेनेडियर्स ने पर्याप्त तोपखाना सहायता के बिना तोलोलिंग पर हमला किया और अभूतपूर्व साहस दिखाया, लेकिन भारी नुकसान उठाना पड़ा। लगभग 1 महीने तक चले संघर्ष के बाद भी चोटी भारतीय सेना की पहुंच से दूर थी। ऐसे में सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक के निर्देश पर कुपवाड़ा से द्वितीय बटालियन, द राजपूताना राइफल्स – 2 राज रिफ को 24 घंटे के भीतर गुमरी पहुंचने का आदेश मिला। बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल एम. बी. रविंद्रनाथ ने सिर्फ 1 दिन के अनुकूलन के बाद 80 चुने हुए सैनिकों को 4 दलों में बांटकर हमले की योजना बनाई। हमले से पहले उन्होंने सैनिकों से कहा, “मैं तुम्हारा कमांडिंग ऑफिसर हूँ और तुम मेरा परिवार हो। आज मैं तुमसे अपने लिए केवल एक चीज़ माँगता हूँ- मुझे तोलोलिंग दे दो। इस पर सूबेदार भंवरलाल भाखर ने कहा, सर, आप सुबह तोलोलिंग टॉप पर आइए, वहीं मुलाकात होगी।

भीषण लड़ाई और फहराया तिरंगा आमने-सामने की भीषण लड़ाई के बाद 2 राजपूताना राइफल्स ने दुश्मन के ठिकानों पर कब्जा कर तोलोलिंग की रणनीतिक चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। यह कारगिल युद्ध का निर्णायक मोड़ बना। लेकिन इस जीत की कीमत बहुत बड़ी थी। इस अभियान में 4 अधिकारी, 5 जेसीओ और 47 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। सैकड़ों जवान घायल हुए। शहीद हुए प्रमुख वीर- मेजर आचार्य, मेजर विवेक गुप्ता, कैप्टन विजयंत थापर, सूबेदार भंवरलाल भाखर, सूबेदार सुमेर सिंह, हवलदार यशवीर तोमर, लांस नायक बचन सिंह और अन्य। महावीर चक्र- मेजर विवेक गुप्ता, नायक दिगेंद्र कुमार, वीर चक्र- कर्नल एम. बी. रविंद्रनाथ, हवलदार यशवीर तोमर, सूबेदार सुमेर सिंह। कर्नल रविंद्रनाथ सेना से रिटायर होने के बाद भी शहीदों के परिवारों के साथ खड़े रहे। उन्होंने शहीदों की विधवाओं, बच्चों और माता-पिता की शिक्षा, पेंशन और अन्य जरूरतों की जिम्मेदारी ली।तोलोलिंग में शहीद लांस नायक बचन सिंह के पुत्र हितेश कुमार जब आईएमए देहरादून से पास होकर उसी बटालियन में अधिकारी बने, तो उनकी माता ने इसका श्रेय कर्नल रविंद्रनाथ को दिया। कैप्टन दिलीप कुमार सिंह ने कहा कि तोलोलिंग केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान की गाथा थी जिसने पूरे कारगिल युद्ध की दिशा बदल दी। भारत माता के उन अमर वीर सपूतों को शत-शत नमन।



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