IC News and Media House Private Limited


Bhopalशिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के वैभवशाली स्वरूप विषय पर कार्यक्रम

रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल मध्यप्रदेश

उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल हमारे गौरवशाली अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि विकसित भारत के उज्ज्वल भविष्य की भी सशक्त आधारशिला है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय शिक्षा दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित करने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया है। यह नीति विद्यार्थियों को केवल ज्ञान और कौशल ही नहीं, बल्कि संस्कार, आत्मगौरव, भारतीयता एवं राष्ट्र निर्माण के मूल्यों से भी जोड़ रही है। भोपाल स्थित सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय में “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के वैभवशाली स्वरूप” विषय पर आयोजित बौद्धिक कार्यक्रम “श्री गुरुदेवाय नमः” को संबोधित कर रहे थे। उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को प्रभावी रूप से लागू करने वाले राज्यों में देशभर में अग्रणी रहा है और भारतीय ज्ञान परम्परा के समृद्ध समावेश की दिशा में भी सतत् कार्य कर रहा है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परम्परा को पाठ्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है। प्रथम वर्ष के प्रथम अध्याय में भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश इसी संकल्प का परिणाम है। हमारी ज्ञान परम्परा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों, संस्कारों, शोध, नवाचार और लोककल्याण की अक्षुण्ण परंपरा है। हमारे पूर्वजों ने अपने ज्ञान, व्यवहार और चरित्र से विश्व को दिशा दी तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण किया। आज आवश्यकता है कि इस अमूल्य विरासत का युगानुकूल परिप्रेक्ष्य में शोध, अनुसंधान एवं वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाए, ताकि भारतीय ज्ञान आधुनिक विश्व के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सके। उन्होंने कहा कि हमारा प्रत्येक नवाचार लोककल्याण के लिए होना चाहिए।राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय शिक्षा दर्शन को पुनः स्थापित करने के साथ शिक्षा को जीवन और प्रकृति से जोड़ने का कार्य किया है। विद्यालयीन शिक्षा में बच्चों के कंधों से बस्तों का बोझ कम हुआ है तथा प्रकृति एवं संस्कृति आधारित शिक्षण को बढ़ावा मिला है। उच्च शिक्षा में भी बहुविषयक अध्ययन, अनुसंधान, कौशल विकास, नवाचार एवं रोजगारोन्मुखी शिक्षा के साथ संस्कारयुक्त शिक्षण पर विशेष बल दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण, रोजगारोन्मुखी एवं संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करना प्रदेश सरकार का ध्येय है। प्रदेश सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए आवश्यक अधोसंरचना एवं मानव संसाधन को सुदृढ़ कर रही है। महाविद्यालयों में आवश्यक पदों की पूर्ति के लिए निरंतर भर्ती की जा रही है तथा विश्वविद्यालयों में भी शीघ्र ही रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ की जाएंगी। उच्च शिक्षा संस्थानों में गुणवत्ता संवर्धन, संस्थागत उत्कृष्टता तथा राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद के मानकों के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्टेट असेसमेंट एंड एक्रिडिटेशन सेल का गठन किया गया है। यह प्रकोष्ठ महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को मूल्यांकन एवं प्रत्यायन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, तकनीकी सहयोग एवं सतत परामर्श प्रदान करेगा, जिससे संस्थानों की शैक्षणिक एवं प्रशासनिक गुणवत्ता और अधिक सुदृढ़ होगी। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य केवल नेक ग्रेड प्राप्त करना नहीं, बल्कि शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता को नई ऊँचाइयों तक ले जाना है। आने वाले दो-तीन वर्षों में प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप और अधिक आधुनिक, पारदर्शी एवं विद्यार्थी-केंद्रित होगा। विश्वविद्यालयों में परीक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाया जा रहा है। डिजिटल वैल्यूएशन की दिशा में तेजी से कार्य हो रहा है तथा विद्यार्थियों को उनकी उत्तरपुस्तिकाओं की डिजिटल कॉपी उपलब्ध कराने की कार्य योजना पर भी अमल किया जा रहा है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए श्रेष्ठ जीवन पद्धति, भारतीयता, आत्मगौरव और स्वत्व के भाव को जागृत करना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल भाव समाज में भारतीयता का भाव स्थापित करना है। उच्च शिक्षा में परिवर्तन का यह दौर वास्तव में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का समय है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, हरिद्वार के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल उद्देश्य व्यक्ति के भीतर संस्कार, संवेदनशीलता और ईश्वरीय चेतना का विकास करना है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा के तीन प्रमुख सूत्र बताते हुए कहा कि पहला—भगवान हर क्षण हमारे साथ हैं, इसलिए प्रत्येक कर्म ईश्वर को साक्षी मानकर करना चाहिए। दूसरा—प्रत्येक नारी में मातृशक्ति का स्वरूप देखकर उसका सम्मान करना चाहिए। तीसरा—परधन को स्पर्श करने का भी विचार नहीं आना चाहिए, क्योंकि ईमानदारी और चरित्र ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान हैं। उन्होंने कहा कि यही जीवन मूल्य भारतीय संस्कृति को विश्व में विशिष्ट बनाते हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति इन्हीं मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बन रही है।

 

ChatGPT Image Jun 19, 2026, 03_57_34 PM

Related Articles

Back to top button