Chhattisgarh News : सर्पदंश मुआवजा घोटाला :छोटी मछलियां सलाखों के पीछे…17.24 करोड़ के कथित फर्जीवाड़े में डॉक्टर

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
जिस तरह से सांप काटने का मुआवजा का प्रकरण का निराकरण हो रहा है फर्जी प्रकरण के चलते इस तरह का मामला केवल एक ही जिले को दोषी नहीं करार दिया जा सकता विभिन्न जिलों में इसका विशेष टीम गठित कर जांच कराई जा सकती है क्योंकि ग्रामीण स्तर से बड़े अस्पताल तक प्रकरण जाता है जैसा कि पुलिस थाना के द्वारा पुलिस थाना में ही मामूली में मृत्यु रहता है उसको दलाल लोग सक्रिय होकर मेडिकल रिपोर्ट में पुलिस प्रकरण में सांप काटने का प्रकरण बना दिया जाता है इस तरह से प्रत्येक जिले के थाना क्षेत्र में दलाल सक्रिय रहते हैं इसलिए प्रत्येक जिले का थाना से रिकॉर्ड को मंगाया जाए और उन प्रकरणों को सीबीआई जांच कराई जाए जिसमें सांप काटने का विशेष प्रकरण में फर्जीवाड़ा हो सकता है इसके अंतर्गत जितने भी जिले हैं वहां के पुलिस थाना पुलिस अधीक्षक भी गिरफ्त में आ सकते हैं क्योंकि पुलिस थाना के माध्यम से पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाता है की हां वास्तव में जिनको सांप ने काटा है उसका सही रिपोर्ट है स्पष्ट होने पर पुलिस अधीक्षक उसे पर हस्ताक्षर करके उसको मुआवजा के लिए निर्धारित करता है।
चेहरा किसका और कौन का शातिर बदमाश? सर्पदंश मुआवजा घोटाला :छोटी मछलियां सलाखों के पीछे…17.24 करोड़ के कथित फर्जीवाड़े में डॉक्टर,बाबू, वकील,परिजन,पुलिस कर्मी और दलाल गिरफ्तार…लेकिन पर्दे के पीछे चेहरा किसका और कौन का शातिर बदमाश बिलासपुर का बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाला अब सिर्फ फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट या चार लाख रुपए के मुआवजे तक सीमित मामला नहीं रह गया है। जैसे-जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस पूरे नेटवर्क की परतें खुल रही हैं। अब तक डॉक्टर, वकील, बाबू, बैंककर्मी, ड्राइवर और मृतकों के परिजनों सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल छोटे-छोटे किरदार ही कानून के शिकंजे में आए हैं और इस पूरे खेल के बड़े चेहरे अभी भी बेखौफ हैं? जिन्होंने मुआवजा का आदेश जारी किया है। सिम्स की पूर्व डॉक्टर डॉ. प्रियंका सोनी की गिरफ्तारी ने पूरे घोटाले को नया मोड़ दे दिया है। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने सामान्य मौत या हार्ट अटैक जैसे मामलों को सर्पदंश से मौत बताकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर चार-चार लाख रुपए का सरकारी मुआवजा स्वीकृत हुआ। तोरवा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया गया। पुलिस के अनुसार उनका नाम सिविल लाइन थाना में दर्ज दो अन्य मामलों में भी सामने आया है और वहां अलग से पूछताछ की जाएगी।
एक डॉक्टर नहीं… दर्जनभर डॉक्टर जांच के घेरे में जांच यहीं नहीं रुकी है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान सर्पदंश के संदिग्ध मामलों में पोस्टमार्टम या चिकित्सकीय रिपोर्ट देने वाले 8 से अधिक डॉक्टर पुलिस की रडार पर हैं। सूत्र बताते हैं कि अलग-अलग मामलों में कई डॉक्टरों से लगातार पूछताछ की जा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया व्यक्तिगत स्तर पर हुई या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था। फर्जी पोस्टमार्टम से खुला करोड़ों का रास्ता जांच में सामने आए मामलों के अनुसार कई मौतें वास्तव में हार्ट अटैक, आत्महत्या या अन्य कारणों से हुई थीं। आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उन्हें सर्पदंश दर्शाया गया, जिससे राजस्व विभाग से चार लाख रुपए प्रति प्रकरण की आर्थिक सहायता स्वीकृत हो गई। यहीं से सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए निकलने का रास्ता तैयार हुआ।
डॉक्टर, वकील, बाबू और रिश्तेदार… पूरा सिंडिकेट?
पुलिस जांच में सामने आए नाम इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह मामला केवल एक विभाग तक सीमित नहीं था।
अब तक जिनकी गिरफ्तारी हुई उनमें शामिल हैं—
पूर्व डॉक्टर
अधिवक्ता
एसडीएम कार्यालय के रीडर
तहसीलदार कार्यालय के रीडर
बैंककर्मी
सर्पदंश मुआवजा घोटाला :छोटी मछलियां सलाखों के पीछे… बड़े मगरमच्छ अब भी बाहर?
क्राइमछत्तीसगढ़बिलासपुर सर्पदंश मुआवजा घोटाला :छोटी मछलियां सलाखों के पीछे… बड़े मगरमच्छ अब भी बाहर 17.24 करोड़ के कथित फर्जीवाड़े में डॉक्टर, बाबू, वकील गिरफ्तार… लेकिन सवाल, क्या असली खेल अभी…? बिलासपुर का बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाला अब सिर्फ फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट या चार लाख रुपए के मुआवजे तक सीमित मामला नहीं रह गया है। जैसे-जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस पूरे नेटवर्क की परतें खुल रही हैं। अब तक डॉक्टर, वकील, बाबू, बैंककर्मी, ड्राइवर और मृतकों के परिजनों सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल छोटे-छोटे किरदार ही कानून के शिकंजे में आए हैं और इस पूरे खेल के बड़े चेहरे अभी भी बेखौफ हैं? जिन्होंने मुआवजा का आदेश जारी किया है।
डॉक्टर की गिरफ्तारी से फिर गरमाया मामला
सिम्स की पूर्व डॉक्टर डॉ. प्रियंका सोनी की गिरफ्तारी ने पूरे घोटाले को नया मोड़ दे दिया है। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने सामान्य मौत या हार्ट अटैक जैसे मामलों को सर्पदंश से मौत बताकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर चार-चार लाख रुपए का सरकारी मुआवजा स्वीकृत हुआ।
तोरवा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया गया। पुलिस के अनुसार उनका नाम सिविल लाइन थाना में दर्ज दो अन्य मामलों में भी सामने आया है और वहां अलग से पूछताछ की जाएगी।
एक डॉक्टर नहीं… दर्जनभर डॉक्टर जांच के घेरे में
जांच यहीं नहीं रुकी है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान सर्पदंश के संदिग्ध मामलों में पोस्टमार्टम या चिकित्सकीय रिपोर्ट देने वाले 8 से अधिक डॉक्टर पुलिस की रडार पर हैं।
सूत्र बताते हैं कि अलग-अलग मामलों में कई डॉक्टरों से लगातार पूछताछ की जा रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया व्यक्तिगत स्तर पर हुई या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
फर्जी पोस्टमार्टम से खुला करोड़ों का रास्ता
जांच में सामने आए मामलों के अनुसार कई मौतें वास्तव में हार्ट अटैक, आत्महत्या या अन्य कारणों से हुई थीं। आरोप है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उन्हें सर्पदंश दर्शाया गया, जिससे राजस्व विभाग से चार लाख रुपए प्रति प्रकरण की आर्थिक सहायता स्वीकृत हो गई।
यहीं से सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए निकलने का रास्ता तैयार हुआ।
डॉक्टर, वकील, बाबू और रिश्तेदार… पूरा सिंडिकेट?
पुलिस जांच में सामने आए नाम इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह मामला केवल एक विभाग तक सीमित नहीं था।
अब तक जिनकी गिरफ्तारी हुई उनमें शामिल हैं—
पूर्व डॉक्टर
अधिवक्ता
एसडीएम कार्यालय के रीडर
तहसीलदार कार्यालय के रीडर
बैंककर्मी
निगम से अटैच ड्राइवर
कथित वकील
मृतकों के परिजन
पुलिस का दावा है कि पूरे मामले के पीछे एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था।
मुख्य मास्टरमाइंड अब भी फरार
पुलिस के मुताबिक इस पूरे षड्यंत्र का कथित मुख्य मास्टरमाइंड अधिवक्ता श्रवण वस्त्रकार अभी भी फरार है।
उधर, पहले गिरफ्तार किए जा चुके आरोपियों में अधिवक्ता रंजीत कुमार चतुर्वेदी, मृतकों के परिजन तथा अन्य सहयोगियों की भूमिका की भी जांच जारी है।
15 एफआईआर… लेकिन जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा
अब तक शहर के अलग-अलग थानों—
सिविल लाइन
तोरवा
सरकंडा
बिल्हा
रतनपुर
में कुल 15 प्रकरण सामने आ चुके हैं।
राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट के आधार पर लगातार एफआईआर दर्ज हुई हैं और पुलिस नई कड़ियां जोड़ रही है।
17.24 करोड़ का सवाल कैसे उठा?
पूरा मामला तब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया जब विधानसभा में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए।
बताया गया—
वर्ष 2024 में अकेले बिलासपुर जिले में 431 सर्पदंश मौतें दर्ज की गईं।
जबकि सर्पदंश के लिए प्रसिद्ध जशपुर जिले के कुनकुरी क्षेत्र में पिछले तीन वर्षों में केवल 96 मौतें दर्ज हुईं।
इन आंकड़ों के आधार पर बिलासपुर में 17 करोड़ 24 लाख रुपए का मुआवजा वितरित होने की जानकारी सामने आई।
इसी के बाद उच्च स्तरीय जांच शुरू हुई।
मर्ग रजिस्टर भी जांच के घेरे में
सिविल लाइन पुलिस ने सिम्स का मर्ग रजिस्टर जब्त कर लिया है।
रिकॉर्ड के अनुसार—
2020 – 596 मर्ग
2021 – 481
2022 – 493
2023 – 412
2024 – 479
2025 – 471
इन्हीं रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस अब हर संदिग्ध सर्पदंश मृत्यु की फाइल खंगाल रही है।
80 फीसदी विवेचना एक ही अधिकारी के पास
जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि सर्पदंश से जुड़े लगभग 80 प्रतिशत मामलों की विवेचना सिम्स के तत्कालीन चौकी प्रभारी गुलाब सोनवानी ने की थी।
उनकी भूमिका की जांच के दौरान पुलिस उनके निवास तक पहुंची और तलाशी भी ली। हालांकि पुलिस के अनुसार तलाशी में कोई निर्णायक दस्तावेज बरामद नहीं हुआ।
फर्जी नाम, फर्जी मर्ग नंबर, फर्जी दस्तावेज
जांच में ऐसे मामले भी सामने आए जहां—
मृतक का नाम संदिग्ध मिला,
पता गलत पाया गया,
मर्ग नंबर किसी दूसरे प्रकरण का निकला,
आत्महत्या या सामान्य मौत को सर्पदंश बताया गया,
दस्तावेजों के आधार पर सरकारी सहायता राशि जारी कर दी गई।
कुछ मामलों में पुलिस यह भी जांच रही है कि क्या परिजनों की जानकारी या सहमति के बिना भी मुआवजा निकाला गया।
स्वास्थ्य से राजस्व तक… कई विभागों पर जांच की आंच
अब तक की जांच में जिन विभागों की भूमिका सामने आई है, उनमें—
स्वास्थ्य विभाग
राजस्व विभाग
तहसील कार्यालय
एसडीएम कार्यालय
बैंकिंग प्रणाली
नगर निगम से जुड़े कर्मचारी
शामिल बताए जा रहे हैं।
पुलिस की सबसे बड़ी चुनौती
जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि—
फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट किस स्तर पर तैयार हुई?
मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों ने दस्तावेज सत्यापित किए?
सरकारी राशि किस-किस खाते तक पहुंची?
लाभार्थियों और बिचौलियों के बीच धन का प्रवाह कैसे हुआ?
और क्या दर्ज 15 मामलों से आगे भी ऐसे प्रकरण मौजूद हैं?
अब तक की कार्रवाई एक नजर में
15 संदिग्ध प्रकरण दर्ज।
सिम्स की पूर्व डॉक्टर डॉ. प्रियंका सोनी गिरफ्तार।
एसडीएम कार्यालय के रीडर गिरफ्तार।
तहसील कार्यालय के रीडर गिरफ्तार।
अधिवक्ता, कथित वकील, बैंककर्मी, ड्राइवर और मृतकों के परिजन गिरफ्तार।
8 से अधिक डॉक्टर जांच के घेरे में।
मुख्य आरोपी बताए जा रहे अधिवक्ता की तलाश जारी।
सिम्स का मर्ग रजिस्टर जब्त।
15 से अधिक स्थानों पर पुलिस की दबिश,
कई और डॉक्टरों एवं कर्मचारियों से पूछताछ जारी।

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