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Uttar Pradesh News : संघर्ष, जनसमर्थन और अपनों की बेरुखी के बीच क्यों बिसरा दिए गए ये दो स्तंभ! विकास की नई इबारत और सत्ता के निशाने पर रज़ा मोहम्मद की जनप्रिय राजनीति

त्याग, समर्पण और जनता के लिए आधी रात भी मुस्तैद रहने वाला व्यक्तित्व सांगठनिक कौशल से मकबरा कांड तक- मुखलाल पाल के बेबाक और निडर तेवर

रिपोर्टर मनीष फतेहपुर, उत्तर प्रदेश

समीकरणों का जोड़-घटाना नहीं है, बल्कि यह जनमानस के दिलों पर उकेरी गई उन इबारतों का नाम है जिन्हें वक़्त की गर्द भी धुंधला नहीं पाती। अल्लामा इक़बाल का एक मशहूर शेर इस संदर्भ में मौजूं बैठता है- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा। यह पंक्ति फतेहपुर की धरा के दो ऐसे जुझारू व्यक्तित्वों पर बिल्कुल सटीक बैठती है, जिन्होंने विपरीत झंझावातों के बीच न केवल अपनी हस्ती को बनाए रखा, बल्कि ज़िले की सियासत में अपने रसूख और काम की अमिट छाप छोड़ दी है। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि यहाँ अंतिम फैसला जनता की अदालत करती है, जहाँ किसी की राजनैतिक लकीर को मिटाना इतना आसान नहीं होता। अपने लगभग साढ़े तीन दशक के लंबे पत्रकारिता जीवन में मैंने राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कई चेहरों को बनते और बिगड़ते देखा है। इस दीर्घकालीन अनुभव के आलोक में मैं यह पूरी तटस्थता के साथ कह सकता हूँ कि जिन जुझारू हस्तियों से मेरा आमना-सामना हुआ, उनमें ये दोनों व्यक्तित्व सार्वजनिक जीवन में कर्मठता और जन-उपलब्धता का एक उच्च स्तरीय मापदंड स्थापित करते हैं। यह संभव है कि कुछ लोग इनके निजी जीवन, कार्यशैली या व्यावसायिक दृष्टिकोण को अलग चश्मे से देखते हों और इस पर समाज में मतभिन्नता हो सकती है- जो कि एक जीवंत समाज का स्वाभाविक हिस्सा है- किंतु एक जननेता के रूप में इनका राजनीतिक कद निःसंदेह एक ऐसा प्रतिमान है जिसे याद करना और समकालीन राजनीति को याद दिलाना बेहद जरूरी है। पत्रकारिता का धर्म भी यही है कि जो सच ज़मीन पर दिख रहा है, उसे बिना किसी लाग-लपेट के, जनमानस की आवाज़ बनाकर सामने लाया जाए। हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के नेता रज़ा मोहम्मद और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व ज़िला अध्यक्ष मुखलाल पाल की, जिन्हें राजनीतिक चक्रव्यूह के तहत भले ही हाशिए पर धकेले जाने की पुरज़ोर कोशिश की गई हो, लेकिन जनमानस के दिल से इन्हें बिसराना नामुमकिन साबित हो रहा है।

नगर पालिका परिषद फतेहपुर के चेयरमैन प्रतिनिधि रहते हुए रज़ा मोहम्मद ने शहरी विकास का जो खाका खींचा, वह आने वाले दशकों तक नज़ीर के रूप में देखा जाएगा। एक छोटे से वार्ड के सभासद पद से म्युनिसिपल राजनीति की शुरुआत करने वाले रज़ा मोहम्मद ने निर्दलीय और कांग्रेस के गलियारों से होते हुए जब समाजवादी पार्टी का दामन थामा और अपनी माता जी नज़ाकत ख़ातून को पालिका अध्यक्ष बनवाया, तो शहर ने विकास की एक नई परिभाषा देखी। विरोधाभास देखिए कि रज़ा मोहम्मद का यह पूरा स्वर्णिम कार्यकाल सूबे में भाजपा सरकार के दौरान था। यही कारण है कि वे पूरे समय सत्ताधारी दल के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सीधे निशाने पर रहे। राजनीतिक द्वेष की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिली जब विकास कार्यों के शिलापट्टों से उनका नाम तक मिटाने के लिए सरकारी और प्रशासनिक मशीनरी का खुलकर दुरुपयोग किया गया, लेकिन पत्थरों से नाम मिटाने की यह कोशिश जनता के दिलों में छपी उनकी इबारत को धुंधला नहीं कर सकी। इतिहास गवाह है कि विकास किसी एक नाम का मोहताज नहीं होता, वह तो जनता की सहूलियत में सांस लेता है। इसके बावजूद उन्होंने वीआईपी रोड पर वन-वे ट्रैफिक की व्यवस्था, सड़कों का बेहतरीन सुदृढीकरण और तिरंगा स्ट्रीट लाइट का जो प्रचलन शुरू किया, उसने शहर की सूरत बदल दी। इसके अलावा अस्ती-कोतवाली रोड का चौड़ीकरण, सदर अस्पताल से पटेल नगर चौराहे तक का सुन्दरीकरण व वन-वे ट्रैफिक और अंततः आईटीआई रोड का कायाकल्प उनके दूरदर्शी सोच के जीवंत प्रमाण हैं। शहर के सौंदर्य और उसकी पहचान को नया आयाम देने में उनकी सोच का असर आज भी साफ़ दिखाई देता है। नगर पालिका कार्यालय के बाहर आसमान को छूता हुआ गगनचुंबी लहराता तिरंगा, पटेल नगर चौराहे के पास युवाओं और आम जनमानस के आकर्षण का केंद्र बना आई लव फतेहपुर का सेल्फी पॉइंट तथा शहर के प्रत्येक प्रमुख चौराहे पर स्थापित की गईं राष्ट्र के महापुरुषों की भव्य मूर्तियां- ये सब रज़ा मोहम्मद की दूरगामी एवं विकासपरक सोच का जीवंत प्रतिबिंब हैं, जो शहर में दाखिल होने वाले हर शख्स को उनकी कार्यशैली की याद दिलाती हैं।

उनकी इस सार्वजनिक सक्रियता और जनसेवा के जुनून के पीछे एक गहरा व्यक्तिगत त्याग भी छिपा है। जनता के सरोकारों, निरंतर संघर्षों और राजनैतिक झंझावातों के बीच रज़ा मोहम्मद जैसे अपना घर बसाना ही भूल गए। दूसरों की खुशियों को संवारने और न जाने कितनी बेसहारा व ग़रीब लड़कियों का कन्यादान, विवाह और निकाह अपने हाथों से करवाने वाले रज़ा मोहम्मद खुद आज तक अविवाहित हैं। जिसने अपना पूरा जीवन शहर और यहाँ के लोगों के नाम समर्पित कर दिया, आज विडंबना देखिए कि व्यवस्था और सिस्टम उन्हें फतेहपुर की सरज़मीन पर टिकने न देने और बेदखल करने पर आमादा नज़र आ रहा है। फिर भी, रज़ा मोहम्मद की लोकप्रियता का सबसे बड़ा स्तंभ उनकी जनता के लिए हर समय उपलब्धता रही। आधी रात के बारह बजे हो या भोर की किरण फूटने से पहले सुबह चार बजे का वक्त, मोबाइल की दूसरी घंटी बजने से पहले उनका कॉल रिसीव करना उनकी सहजता को दर्शाता था। नगर पालिका की प्रशासनिक मशीनरी पर उनकी ऐसी पकड़ थी कि एक फोन कॉल पर पूरा अमला मुस्तैद होकर तय समय में रिपोर्ट सौंपता था। सुख हो या दुख, मौत-मिट्टी हो या शादी-मुंडन, आम जनमानस के बीच उनकी शारीरिक मौजूदगी ने उन्हें सही मायने में जनप्रिय बनाया। एक जनप्रतिनिधि के लिए जनता का भरोसा ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है, और रज़ा मोहम्मद ने उस पूंजी को संजोने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह राजनीति का क्रूर चरित्र ही है कि इस जुझारू व्यक्तित्व को उनके अपनों ने ही वह न्याय नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। आज भले ही राज कुमार मौर्य नगर पालिका अध्यक्ष हों, चंद्र प्रकाश लोधी सदर सीट से विधायक हों या नरेश उत्तम पटेल संसद में फतेहपुर का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, इन सबकी राजनीतिक वैतरणी पार लगाने में रज़ा मोहम्मद की ज़मीनी लोकप्रियता का एक बड़ा योगदान रहा है। हालांकि, मौजूदा समय में ये तीनों जनप्रतिनिधि जनमानस की कसौटी पर कितने खरे उतर रहे हैं, यह जनता भली-भांति देख रही है और वक्त आने पर इसका हिसाब भी जनता की अदालत में ही होगा।

हाल के वर्षों में रज़ा मोहम्मद को वैधानिक और प्रशासनिक घेरे में लेकर अपराधी या माफिया साबित करने की जो पुरज़ोर सियासी कोशिशें हो रही हैं, उससे प्रशासन की साख ही धूमिल हुई है। जिला बदर, गैंगस्टर, मुकदमों की फेहरिस्त और हालिया इनाम घोषित करने जैसी ताबड़तोड़ कार्रवाइयों को देखकर जनमानस में अब यह तीखा व्यंग्य भी तैर रहा है कि जिला प्रशासन और पुलिसिया कार्यवाही कुछ ज़्यादा ही नहीं हो रही है३? लोगों का मानना है कि इतनी मुस्तैदी और सरकारी ऊर्जा अगर ज़िले की वास्तविक जनसमस्याओं, बदहाल बुनियादी ढांचों और वास्तविक अपराधों को रोकने पर दिखाई जाती, तो शायद फतेहपुर की तस्वीर आज कुछ और होती। बहरहाल, व्यवस्था की हताशा इन दमनकारी कदमों में साफ झलकती है, जिसके दूरगामी राजनीतिक परिणामों के लिए सिस्टम को तैयार रहना होगा। विरोधी चाहे जितनी फाइलें खुलवा लें, लेकिन आम जनता के दिल में बसी उनकी कर्मठ छवि को मिटाना फिलहाल सत्ताधारी दल, प्रशासन या उनके अपने ही कुछ खुन्नस खाए सपाइयों के बस की बात नहीं दिखती। दूसरी ओर, भाजपा खेमे के एक ऐसे ही धाकड़ नेता हैं मुखलाल पाल। लगभग दो दशक पहले जब वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के ऊर्जावान ज़िला अध्यक्ष थे, तब उनके तेवरों ने ज़िले की सियासत में अच्छी हलचल मचाई थी। युवा मोर्चा की अध्यक्षी का कार्यकाल सफलतापूर्वक समाप्त होने के बाद, वे सांगठनिक विस्तार और हालाती कारणों के चलते कानपुर चले गए। वहाँ उन्होंने कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की राजनीति में क्षेत्रीय महासचिव व उपाध्यक्ष के रूप में काम करते हुए अपनी सांगठनिक क्षमता का लोहा मनवाया।

आगे चलकर, जब फतेहपुर भाजपा का स्थानीय संगठन अंदरूनी खींचतान के कारण डगमगा रहा था, तब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को मुखलाल पाल के रूप में एक बेहद मजबूत विकल्प दिखा और करीब ढाई साल पहले उन्हें ज़िला अध्यक्ष की कमान सौंपकर वापस उनकी गृह भूमि पर भेजा गया। ज़िला अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने जो प्रभाव छोड़ा, उससे जनमानस में उनकी छवि एक अत्यंत जुझारू नेता के रूप में उभरी। ज़िला अध्यक्ष के रूप में अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने जो लकीर खींची, उसने उन्हें भविष्य के एक सशक्त जनप्रतिनिधि के रूप में स्थापित कर दिया। दशक पुराना नंदी चौराहा विवाद हो या फिर सत्तर साल पुराना तांबेश्वर मंदिर से जुड़े कई बीघे विवादित भूखंड का मामला, जिस बेबाकी और निडर अंदाज में उन्होंने इन जटिल मुद्दों का पटाक्षेप कराया, वह उनके कुशल नेतृत्व को दर्शाता है। अति चर्चित मकबरा कांड को फतेहपुर की जनता शायद ही कभी भूले, जब डाक बंगले के बाहर सड़क पर खड़े होकर मुखलाल पाल ने सार्वजनिक रूप से मोबाइल का स्पीकर ऑन करके तत्कालीन पुलिस कप्तान को सीधे ललकारा था। उनके इस निडर और बेबाक अंदाज के चाहने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो उनमें एक कद्दावर जनप्रतिनिधि बनने का माद्दा देखते हैं। ऐसे में कोई बड़ी अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर आसन्न विधानसभा चुनाव में उनका आगाज़ नए रूप में हो जाए। पिछड़े वर्ग से आने वाले मुखलाल पाल मौजूदा समय में तांबेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं।

राजनीति की बिसात यहाँ भी वैसी ही बिछी। सांगठनिक बदलाव के तहत करीब आठ महीने पहले उन्हें ज़िला अध्यक्ष पद से मुक्त कर दिया गया और कुछ विवादों में घसीटने का प्रयास हुआ। सत्ताधारी दल के भीतर ही उनके विरोधियों की एक पूरी फौज खड़ी हो गई, जिसके चलते मौजूदा समय में उनके पास कोई दूसरा बड़ा सांगठनिक पोर्टफोलियो नहीं है। लेकिन विडंबना देखिए कि पद से हटने के महज आठ महीनों के भीतर ही खुद पार्टी के कार्यकर्ताओं को उनका जुझारू कार्यकाल याद आने लगा है। तमाम अवरोधों के बावजूद जनमानस में उनकी हस्ती दिन पर दिन निखरती जा रही है, जिसने गैर दलों के साथ-साथ पार्टी के अंदर उनके विरोधी नेताओं को भी सकते में डाल रखा है। सत्ता का पद तो अस्थाई होता है, लेकिन जनता के बीच जो धाक बनती है, उसे किसी आदेश से निरस्त नहीं किया जा सकता। यदि हम गहरे राजनैतिक अंतर्विरोधों को खंगालें, तो एक बेहद दिलचस्प और तार्किक पहलू सामने आता है। रज़ा मोहम्मद पर जब प्रशासनिक दमन का चक्र चलता है, तो सत्ताधारी भाजपा का ही एक बड़ा अंदरूनी धड़ा, जो दबी ज़ुबान में उनके विकास कार्यों का कायल रहा है, इसे राजनैतिक अति मानता है। ठीक इसी प्रकार, जब मुखलाल पाल को भाजपा संगठन में किनारे किया गया, तो समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के कई कद्दावर नेता भी उनके जुझारू तेवर और निर्भीक शैली की प्रशंसा करते पाए गए। यह अदृश्य कद्रदानों का होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इन दोनों नेताओं की स्वीकार्यता अपनी-अपनी पार्टियों के सीमित दायरों को लांघकर पूरे फतेहपुर के जनमानस में व्याप्त है।

इन दोनों जुझारू और चौबीसों घंटे सुलभ रहने वाले बड़े चेहरों को कृत्रिम रूप से मुख्यधारा से दूर रखने की इस साज़िश ने फतेहपुर की ज़मीनी सियासत में एक बड़ी राजनैतिक शून्यता पैदा कर दी है। आज आम कार्यकर्ता ंदक आम जनता खुद को एक बड़े संकट के समय नेतृत्वविहीन महसूस करती है, क्योंकि ज़मीन से जुड़े ऐसे संघर्षशील नेता रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते। किसी भी ज़िले की सांगठनिक शक्ति को इस तरह अंदरूनी खींचतान से कमज़ोर करने का खामियाजा अंततः राजनैतिक दलों को ही भुगतना पड़ता है। यदि हम समग्रता में देखें, तो सपा के रज़ा मोहम्मद और भाजपा के मुखलाल पाल- दोनों ही नेताओं का कार्यकाल अपनी ही पार्टी के भीतर स्थानीय स्तर पर साज़िशों और निपटाने की कवायद का शिकार रहा है। अपनों की बेरुखी के कारण भले ही इन्हें मुख्यधारा से बिसराने का प्रयास किया गया हो, लेकिन इस कड़वी सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि धुर विरोधी भी मन ही मन इनकी सांगठनिक और राजनैतिक क्षमताओं के कायल रहे हैं। स्थानीय स्तर पर भले ही इन दोनों नेताओं को हाशिए पर धकेले जाने का प्रयास किया जाता रहा हो, लेकिन दोनों की ही अपने-अपने दल के शीर्ष नेतृत्व (हाईकमान) के स्तर पर बेहद मजबूत पैठ है और यही उनकी असली ताकत है। राजनीति में कोई भी मोड़ अंतिम नहीं होता। ऐसे में यदि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये दोनों जुझारू व्यक्तित्व नए कलेवर और नए रूप में चुनावी समर का आगाज़ करते हुए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाएं, तो इसमें किसी को कोई अचरज नहीं होना चाहिए। क्योंकि जनता आज भी व्यवस्था के शोर के बीच चेहरों के पीछे छिपे वास्तविक संघर्ष, व्यक्तिगत त्याग, सांगठनिक कलात्मकता और जन-सरोकार को गहराई से पहचानती है और लोकतंत्र का अंतिम फैसला हमेशा जनभावनाओं के पक्ष में ही झुकता है!

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