Chhattisgarh कुसमुंडा में भेदभाव: समर कैंप सिर्फ अफसरों और कर्मचारियों के बच्चों के लिए! बाकी तो सिर्फ झेलने के लिए…..
SECL कुसमुण्डा के ‘विशेष’ समर कैंप में खदान प्रभावित बच्चों के लिए एंट्री बंद 👉🏻आखिर CSR और सामाजिक जिम्मेदारी सिर्फ भाषणों तक ही क्यों?

रिपोर्टर मनोज मानिकपुरी कोरबा छत्तीसगढ़
कोरबा-कुसमुंडा। “अपना तो खून पानी, जीना-मरना बेमानी… आपकी हर अदा है अपनी देखी भाली…… मशहूर फिल्म लावारिस के एक प्रसिद्ध गाने के यह बोल SECL की कुसमुण्डा परियोजना प्रबंधन की नीति और नीयत के लिए बहुत ही सटीक बैठते हैं। जब, एक तरफ एसईसीएल कुसमुंडा क्षेत्र बड़े-बड़े बैनरों और रंगीन प्रचार के साथ “SECL Summer Camp 2026” का आयोजन कर बच्चों के सर्वांगीण विकास, फिटनेस, क्रिएटिविटी और लर्निंग की बातें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस चमकदार आयोजन के पीछे एक ऐसा कड़वा सच भी छिपा है, जो खदान प्रभावित गांवों के परिवारों के बच्चों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।
बैनर में साफ लिखा गया है कि यह 21 दिवसीय समर कैंप केवल “SECL Employees के वार्ड्स” के लिए आयोजित किया जा रहा है। यानी जिन लोगों की जमीनों पर खदानें खड़ी हुईं, जिनके खेत उजड़े, जिनके घर टूटे, जिनकी पीढ़ियां विस्थापन और प्रदूषण झेल रही हैं, उनके बच्चों के लिए इस कैंप में कोई जगह नहीं!
18 मई से 10 जून 2026 तक इंदिरा स्टेडियम, कुसमुंडा में होने वाले इस आयोजन को भले ही “फिटनेस, लर्निंग और जॉय” का नाम दिया गया हो, लेकिन खदान प्रभावित परिवारों के लिए यह “भेदभाव और उपेक्षा” का प्रतीक बनता जा रहा है।
जिनकी जमीन गई, उनके बच्चों का अधिकार भी गया?
कुसमुंडा, गेवरा, दीपका और आसपास के खदान प्रभावित क्षेत्रों के हजारों परिवारों ने वर्षों पहले देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए अपनी उपजाऊ जमीनें, मकान, खेत, पेड़-पौधे और जीवनभर की पूंजी तक खो दी। कई गांव नक्शे से मिट गए।
लोगों ने यह सोचकर सब कुछ सह लिया कि आने वाली पीढ़ियों को बेहतर अवसर मिलेंगे। लेकिन आज हालात यह हैं कि उन्हीं परिवारों के बच्चे ऐसे आयोजनों के बाहर खड़े हैं, जबकि जिनकी नौकरी है, सुविधा है, क्वार्टर है और सुरक्षित जीवन है, उन्हीं तक अवसर सीमित कर दिए गए हैं।
प्रभावित लोग सिर्फ धूल-धुआं झेलने के लिए हैं क्या?
खदान प्रभावित गांवों के लोग रोजाना जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, वह किसी से छिपा नहीं हैं:-
कोयले की धूल से बिगड़ता स्वास्थ्य
दूषित और घटता भूजल
भारी वाहनों से दुर्घटना का खतरा
दिन-रात कंपन और ब्लास्टिंग
खेती और पर्यावरण का विनाश
लगातार बढ़ता प्रदूषण
असुरक्षित और अव्यवस्थित यातायात
सवाल यह उठ रहा है कि – क्या इन लोगों की भूमिका सिर्फ इतना ही है कि वे अपनी जमीन दें, प्रदूषण झेलें, बीमारियां सहें और बदले में उनके बच्चों को एक समर कैंप तक में शामिल होने का अधिकार भी न मिले?
CSR सिर्फ रिपोर्टों और विज्ञापनों के लिए?
एसईसीएल और कोल इंडिया जैसी कंपनियां हर साल करोड़ों रुपये CSR और सामुदायिक विकास के नाम पर खर्च करने का दावा करती हैं। लेकिन जब बच्चों के विकास और सामाजिक सहभागिता की बात आती है, तो खदान प्रभावित गांवों के बच्चे आखिर प्राथमिकता में क्यों नहीं आते?
यदि कंपनी वास्तव में सामाजिक सरोकार निभाना चाहती है, तो ऐसे आयोजनों में कम से कम 40 से 50 प्रतिशत सीटें खदान प्रभावित और विस्थापित परिवारों के बच्चों के लिए आरक्षित होनी चाहिए थीं। इससे कंपनी और स्थानीय समुदाय के बीच भरोसा भी मजबूत होता।
स्थानीय लोगों में नाराजगी
क्षेत्र के कई लोगों का कहना है कि एसईसीएल हर बार “समुदाय के विकास” की बातें तो करता है, लेकिन व्यवहार में स्थानीय और प्रभावित परिवार खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं। लोगों का कहना है कि यदि कंपनी वास्तव में संवेदनशील है, तो उसे तत्काल इस फैसले पर पुनर्विचार कर खदान प्रभावित बच्चों के लिए भी समर कैंप के दरवाजे खोलने चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक समर कैंप का नहीं है…
सवाल उस अधिकार, सम्मान और हिस्सेदारी का है, जिसकी कीमत स्थानीय लोगों ने अपनी जमीन और जिंदगी देकर चुकाई है।




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