बीईओ अनिल दास की पहल से दिव्यांग रेखा को मिला ‘राइटर’

कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों आसमान छूने की तो शारीरिक अक्षमता भी आड़े नहीं आती। कुछ ऐसा ही जज्बा देखने को मिल रहा है बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर ब्लॉक के नांगुर गांव की रहने वाली रेखा नाग में, रेखा 10वीं कक्षा की छत्तीसगढ़ बोर्ड परीक्षा में शामिल हो रही हैं, लेकिन उनकी यह राह आसान नहीं थी। परीक्षा केंद्र के दौरे पर निकले जगदलपुर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) अनिल दास की नज़र जब रेखा पर पड़ी, तो उन्होंने देखा कि वह अपनी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद परीक्षा देने का प्रयास कर रही हैं। बीईओ सर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए रेखा से बातचीत की और उनकी सहजता के बारे में पूछा। बातचीत के दौरान रेखा ने स्वीकार किया कि उन्हें लिखने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

बीईओ अनिल दास की त्वरित कार्रवाई और बोर्ड से समन्वय
छात्रा की पीड़ा को समझते हुए बीईओ अनिल दास ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने तत्काल छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल (CGBSE) के अधिकारियों से संपर्क किया और वस्तुस्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बोर्ड को समझाया कि छात्रा को एक ‘राइटर’ (लेखक) की अत्यंत आवश्यकता है ताकि वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सके। बीईओ के निरंतर प्रयासों और समन्वय के बाद बोर्ड ने अनुमति प्रदान की। इसके परिणामस्वरूप, कक्षा 9वीं की छात्रा नव्या निर्मलकर को रेखा के लिए सहायक लेखक के रूप में नियुक्त किया गया।

आज रेखा अपनी सहायक नव्या की मदद से सफलतापूर्वक परीक्षा दे रही हैं। बीईओ अनिल दास ने रेखा के साहस और परीक्षा के प्रति उसके समर्पण की सराहना करते हुए कहा की “रेखा का जज्बा सभी विद्यार्थियों के लिए एक मिसाल है। शारीरिक चुनौतियों के बाद भी उसका शिक्षा के प्रति यह लगाव काबिले तारीफ है। विभाग का लक्ष्य है कि कोई भी मेधावी छात्र संसाधनों या सहयोग के अभाव में पीछे न छूटे। यह एक बहुत ही गहरा और विचारणीय विषय है। आज के समय में जहाँ सुख-सुविधाओं की होड़ लगी है, वहाँ रेखा जैसी छात्रा का संघर्ष हमें जीवन की प्राथमिकताओं का आईना दिखाता है।

रेखा की कहानी हमें तीन बड़े सबक सिखाती है जो आज की युवा पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं:
1.शिक्षा का वास्तविक महत्व: रेखा ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा कोई “बोझ” नहीं, बल्कि एक वरदान है। जहाँ सक्षम लोग पढ़ने से कतराते हैं, वहाँ रेखा अपने पैरों से लिखकर यह बता रही हैं कि ज्ञान प्राप्त करने की तड़प क्या होती है।
2.संसाधनों का मोह नहीं: रेखा ने दिखाया कि सफलता सुविधाओं (जैसे बाइक या मोबाइल) की मोहताज नहीं होती। सफलता केवल मेहनत और निरंतरता से मिलती है।
3.कृतज्ञता (Gratitude): रेखा की कहानी हमें सिखाती है कि हमारे पास जो है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए। आजकल के छात्र छोटी-छोटी कमियों पर शिकायत करते हैं, जबकि रेखा ने अपनी सबसे बड़ी कमी को ही अपनी ताकत बना लिया।

बीईओ अनिल दास जैसे अधिकारियों का सहयोग और रेखा जैसी छात्राओं का जज्बा समाज को यह संदेश देता है कि “असली संस्कार” सुविधाओं को पाने में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने मे है l




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