श्रीमद्भागवत के वचन से पाए, धार्मिक संस्कृति के संदेश

आज के समय में अपनी धार्मिक संस्कृति का दर्शन व समझ केवल भागवत, राम कथा के माध्यम से ही संदेश दिया जाता है। इसके अलावा हमारी वे माताएँ जो साड़ी व सलवार कुर्ते पहनकर अपनी संस्कृति को बचा रहे हैं।

स्वतंत्रता का यह अर्थ नहीं की हम अशोभनीय वस्त्र धारण करें। लोग मंदिर, व धार्मिक स्थलों में भी अशोभनीय वस्त्र धारण करते हैं जो हमारी संस्कृति व संस्कार के विरुद्ध है। मर्यादा का किसी को भी उलंघन नहीं करना चाहिए ।

भगवान विष्णु जी ने एक बार मर्यादा तोड़ कर सती वृंदा के सतित्व का अपमान किया था जिसके कारण भगवान को पत्थर बनना पड़ा जिसे हम शालिग्राम के रूप में पूजते हैं, माता सीता ने भी लक्ष्मण जी के द्वारा खींचे गये लक्ष्मण रेखा को लाँघ कर मर्यादा तोड़ा जिसके कारण उनका हरण रावण द्वारा किया गया।

भगवान को छप्पन भोग से भी वो आनंद नहीं मिलता सबरी और विदुर जी के यहाँ भोजन करने से मिला कहने का अर्थ यह है की भगवान भाव के भुखे है भाव से जूठे व केले के छिलके खाकर भी आनंद प्राप्त कर लेते हैँ।

भगवान उसके मन में बैठते हैं जो निश्छल मन से भक्ति में लीन रहते हैं। जैसे भक्त ध्रुव, प्रहलाद, सबरी, सुदामा विदुर। ये सब भक्ति में लीन होकर भगवान को ही अपना सब कुछ माना।
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