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आजादी के 78 वर्ष बाद भी विकास से वंचित ग्रामीण बिजली सड़क और पुल सुविधा से वंचित

ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता गांवों में आकर बड़े-बड़े वादे करते हैं चुनावों के खत्म होते दिखाई न देते हैं 

ग्रामीणों ने कई बार किया आंदोलन, कर थक चुके उन्होंने ने कहा कि हमारे गांव की ओर देखने तक नहीं आते न ही हमारे आवेदन अब तक नहीं मिली सुनवाई

वहीं उन्होंने ने कहा कि दिन को टीवी पंख बंद रहते है 

नगरी – छत्तीसगढ़ राज्य अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका है। राज्य को “संपन्न एवं सरप्लस बिजली वाला प्रदेश” कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि धमतरी जिले के आदिवासी विकासखण्ड नगरी क्षेत्र सीतानदी अभ्यारण के जंगलों में बसे गांव फरसगांव, खलारी, करही, रिसगांव से अधिक ग्राम आज भी मूलभूत सुविधाओं में जूझ रहे हुए हैं।
सड़क,पुल-पुलिया , बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण आज भी 1947 के दौर जैसी कठिनाइयों का सामना करने को विवश हैं।
राज्य सरकार द्वारा सौर ऊर्जा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों को रोशनी देने की योजना बनाई गई थी, किंतु यह योजना भी अधिकांश गांवों में असफल साबित हो रही है। सोलर लाइटें रात 10 बजे तक तो जलती हैं, लेकिन उसके बाद पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है। कई जगह सौर के बैटरी मेंटेनेंस की ओर विभाग का कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है जिसके चलते रात्रि में लाईन बंद हो जाता है
“हम बिजली के बिना कैसे जिएं?” — यह सवाल नगरी ब्लॉक के करही, रिसगांव और खलारी पंचायत के ग्रामीणों की जुबान पर आज भी है। करही पंचायत के अंतर्गत आने वाले ग्राम मासुलखोई, जोरातराई, उजरावन, मांदागिरी, पंचायत रिसगांव के अंतर्गत आश्रित गांव आमाबाहर, गादुलबहरा, खरका,और  पंचायत खलारी के के आप पास गांव चमेदा, सालेभाठ, जोगीबिरदो, आमझर गाताबहरा, पंचायत फरसगांवके गांव मुखकोट, टोटाझरिया साथ आप पास के गांव के लोगों ने बताया कि 10 से 11 तक ही सौर ऊर्जा का ही लाभ मिलता है उसके बाद पूरे गांव में चारों ओर अंधेरे छा जाता है
वहीं पूरे दिन भर चार्ज,इमरजेंसी लाइन का उपयोग करते है उहोंने कहा कि आधी रात जीवन अधेरी में बिता रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि शासन की कई योजनाओं — जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, महतारी वंदन योजना, और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ तो मिल रहा है, किंतु बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। बरसात के दिनों में इन क्षेत्रों की कच्ची सड़कें कीचड़ में तब्दील हो जाती हैं। सोढूर नदी पर मजबूत पुल न होने के कारण गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।
इसका सीधा असर ग्रामीणों के जीवन पर पड़ता है — विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवाएं ठप हो जाती हैं। प्रसव पीड़ित महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने में भारी दिक्कतें आती हैं। 102 और 108 जैसी आपातकालीन सेवाएं भी इन गांवों तक नहीं पहुंच पातीं। जिसके कारण मोटरसाइकिल में ले जाते है
साथ ही कई ऐसे में ग्रामीण परेशानी का सामना करना पड़ता है कई जगहो पर बड़े बड़े लकड़ी के पुल निर्माण किया गया हैं  मोटरसाइकिल  को अस्पताल तक ले जाने को विवश हैं।
ग्रामीणों ने कई बार आंदोलन किए हैं।, सड़क , बिजली ,और पुल निर्माण की मांग को लेकर कलेक्टर, एसडीएम कार्यालयों में ज्ञापन सौंपे, धरना-प्रदर्शन और पैदल यात्राएं भी कीं, लेकिन आज तक किसी ने उनकी सुध नहीं ली। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता गांवों में आकर बड़े-बड़े वादे करते हैं — “सरकार बनने पर आपकी समस्या हल की जाएगी” — लेकिन चुनाव बीतते ही वही नेता क्षेत्र से गायब हो जाते हैं।
शिक्षक और छात्र भी परेशान
क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था भी बदहाल है। कई बार स्कूल बच्चों एवं शिक्षकों द्वारा नदीनाले को जानजोखी में डाल कर विद्यालय पहुंचे है कई विद्यालयों तक पहुंचना शिक्षकों के लिए कठिन हो गया है। सड़कें जर्जर हैं, परिवहन की सुविधा नहीं है। बच्चे अंधेरे में पढ़ाई करने को मजबूर हैं — सौर लाइट या दीयों की मंद रोशनी में पढ़ाई करना उनकी दिनचर्या बन गई है।
शासन प्रशासन के द्वारा बारिश के पहले नदी नाले में बाढ़ आने के चलते गांवों के सभी लोगों को राशन दुकानों से एकबार 4 माह का राशन कार्ड परिवार को चावल प्रदान कर दिया जाता हैं जिसके कारण कुछ राहत लोगों को मिलता है
ग्रामीणों की उम्मीदें अब भी बाकी हैं
इन सब परेशानियों के बावजूद ग्रामीणों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। वे चाहते हैं कि शासन-प्रशासन उनकी समस्याओं पर ध्यान दे और जल्द ही ठोस कार्रवाई करे, ताकि उनके गांव भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
ग्रामीणों का कहना है कि “विकास के नाम पर केवल वादे किए गए, लेकिन हकीकत में हमें अंधेरे में छोड़ दिया गया है। अब वक्त आ गया है कि सरकार धरातल पर कार्य करे, ताकि आदिवासी अंचल के ये गांव भी ‘विकसित छत्तीसगढ़’ की परिभाषा में शामिल हो सके ग्रामीणों ने बताया कि क्षेत्र की समस्याओं एवं मूलभूत सुविधाओं के अभाव को लेकर ग्राम करही, फरसगांव और खल्लारी पंचायतों के जनप्रतिनिधियों तथा ग्रामीणों ने अपनी बात रखी। इस दौरान करही पंचायत के सरपंच बीरबल पदमाकर, फरसगांव की सरपंच शैलेंदी बाई, रायुधन मरकाम, ग्राम पंचायत खल्लारी के पूर्व सरपंच तुलाराम नेताम, लोकेश कुजाम, भोजराज कुजाम, सेवक राम मरकाम, सादूराम मरकाम, अनकुराम मणजवी, अगरचंद कुजाम, चिंतराम नेताम, गोविंद मडावी, राजेश कुजाम (पूर्व सरपंच फरसगांव), रेवा देवदास, दीनदयाल मरकाम, पंचम कश्यप, राजा राम मरकाम, सुरेंद्र कश्यप, योगेश अग्रवानी, बीरसिंह यादव, कैलाश नेताम, महादेव मरकाम, फग्नूराम, सुकचंद मरकाम, धनेश मरकाम, गंगाराम परदे, जयलाल सोरी, गणेश मरकाम, लखन मरकाम, दयाराम पटेल, दुलारू राम मरकाम, रोशन सोरी तथा दुष्यंत कुजाम सहित समस्त ग्रामवासियों ने अपनी समस्याओं को विस्तारपूर्वक अवगत कराया।
ग्रामीणों ने बताया कि लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है, जिसके समाधान के लिए उन्होंने शासन-प्रशासन से शीघ्र कार्रवाई की मांग की है।
Dhamtari Chhattisgarh News @ Reporter THARUN KUMAR NISHAD

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