*इष्टिकापुरी तपोभूमि से- आज के प्रथम दिवस का वृतांत*

इटावा
आज, ७ नवम्बर… वह दिन जब इटावा की भूमि केवल एक नगर नहीं, बल्कि इष्टिकापुरी तपोभूमि बन उठी।
जब सैकड़ों ब्रह्मचारियों ने उपनयन संस्कार के माध्यम से ज्ञान की प्रथम दीक्षा ग्रहण की, जब आचार्यगणों के उच्चारित वेद-मंत्रों से दिशाएँ पवित्र हुईं, तब ऐसा लगा मानो स्वयं ऋषि-परंपरा पुनः लौट आई हो -उसी तेज, उसी अनुशासन, उसी श्रद्धा के साथ।

यह कोई साधारण अनुष्ठान नहीं…
यह तो आत्मा की शुद्धि का प्रथम सोपान है, वह क्षण है जब मनुष्य स्वयं के भीतर के अंधकार को पहचानता है और अग्नि को साक्षी मानकर उसे त्याग देता है।
आज का यह दिन था -प्रायश्चित का दिन, स्नान का दिन, नांदी का दिन,
जहाँ श्रद्धालुजनों ने दशविध स्नान कर अपने भीतर के पापों, दोषों और कलुष को धोया;
अपने पितरों का स्मरण कर उनके आशीर्वाद से यज्ञ-मार्ग पर चलने की अनुमति मांगी।
कर्मों का शुयहद्धिकरण नहीं, जीवन का पुनर्जन्म है।
यह वह क्षण है जब समाज अपने भीतर झाँकता है और समझता है-
कि जब तक हर व्यक्ति के भीतर यज्ञ नहीं जलेगा, तब तक धर्म, सत्य और करुणा की लौ स्थिर नहीं होगी।इष्टिकापुरी नगरी, यह भूमि जिसने ऋषियों की साधना और वीरों के तप को संजोया है,आज पुनः जग रही है-एक महायज्ञ के रूप में, एक आत्मजागरण के रूप में, एक राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के रूप में।यह महायज्ञ केवल आहुति नहीं, यह एक युग की पुकार है।हर उस आत्मा के लिए जो धर्म की लौ जलाना चाहती है, हर उस नागरिक के लिए जो इस भूमि के पुनर्जागरण में सहभागी बनना चाहता है।आइए,जब अग्नि धधके तो केवल लकड़ी न जले/आपका मोह, आपका भय, आपका संशय भी भस्म हो।आइए,जब मंत्र गूँजे तो केवल शब्द न निकले -आपकी आत्मा का नाद भी उस स्वर में जुड़ जाए।इष्टिकापुरी तपोभूमि आपको पुकार रही है।यह केवल एक आयोजन नहीं,यह भारत की आत्मा के पुनः जागरण की प्रक्रिया हैऔर हर वह व्यक्ति जो इस यज्ञ में आहुति देगा, वह केवल धर्म का साधक नहीं,स्वयं राष्ट्र का पुनर्निर्माता होगा।


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