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Bhopal

रवीन्द्र भवन में दो दिवसीय”भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान सभ्यता, संस्कृति और अस्मिता का सूत्र” का शुभांरभ

रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल मध्य प्रदेश
विश्व भर में अनेकों देश अपनी स्वंतत्रता के बाद, अपनी मातृभाषा के आधार पर विश्वमंच पर आगे बढ़ रहे हैं। हमें भी हीन भावना से मुक्त होकर स्वाभिमान के साथ, अपनी मातृभाषा के आधार पर विश्वमंच पर सिरमौर बनने की ओर अग्रसर होने की आवश्यकता है। इसके लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा अध्यापन का महत्वपूर्ण अवसर दिया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा परिदृश्य में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हैं। भारतीय शिक्षा पद्धति, ज्ञान आधारित शिक्षा पद्धति रही है, रटने की नहीं। हम, भारतीय दर्शन के अनुरूप ज्ञान आधारित शिक्षा देकर श्रेष्ठ नागरिक निर्माण करने की दिशा में सतत् क्रियाशील हैं। भारत वेश भूषा एवं भाषाओं की विविधताओं से परिपूर्ण देश है। हमारे पूर्वजों ने सांस्कृतिक व्यवस्था स्थापित करते हुए देश की एकात्मता को मजबूत किया, इसमें भाषाएं बाध्यता नहीं बनी। भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं, तोड़ने का नहीं। भारत की सभी भाषाएं, भारत की अपनी भाषाएं हैं। उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार रविवार को भोपाल स्थित रविन्द्र भवन के अंजनी सभागार में आयोजित दो दिवसीय “भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान (सभ्यता, संस्कृति और अस्मिता का सूत्र)” विमर्श कार्यक्रम का शुभारम्भ कर संबोधित कर रहे थे। उच्च शिक्षा मंत्री ने सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं दीं। उच्च शिक्षा मंत्री ने एकात्मता के लिए “भाषाई सौहार्दता के परिप्रेक्ष्य में भारतीय भाषाओं की महत्ता” के आलोक में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमने विद्यार्थियों को भारत की सभी भारतीय भाषाओं को सिखाने के लिए संकल्प लिया है, प्रत्येक विश्वविद्यालय आवंटित भारतीय भाषाएं सिखाएंगे, इससे विद्यार्थियों को अन्य राज्यों में रोजगार के अवसर प्राप्त होने पर संवाद में एकरूपता में सहजता होगी। हिंदी भाषी मध्यप्रदेश से, देश भर में भाषाई एकात्मता का संदेश जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेयी के संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषा में दिए उद्बोधन का उल्लेख करते हुए, सभी से अपनी मातृभाषा में विचार व्यक्त करने का आह्वान किया। राज्य सरकार द्वारा हिंदी में इंजीनियरिंग एवं मेडिकल की पढ़ाई शुरू करने से विद्यार्थियों को स्वेच्छा एवं सुविधानुसार भाषा चयन का विकल्प दिया गया है। प्रदेश में यूनानी चिकित्सा पद्धति की पढ़ाई भी हिंदी भाषा में कराई जाएगी, इससे हिंदी भाषी विद्यार्थियों को इस आयुष विधा को पढ़ने का अवसर मिल सकेगा। भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़े विविध विषयों पर प्रकाश डालते हुए भारतीय पुरातन ज्ञान के आलोक में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं के आधार पर, विश्वमंच पर भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 तक भारत, विश्व का सबसे समृद्ध एवं विकसित देश होगा। वसुधैव कुटुंबकम् के दृष्टिकोण के साथ भारत विश्वमंच पर पुनः आगे बढ़ रहा है, कोविड के संकटकाल में लोककल्याण भाव से, अन्य देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उन्होने कहा कि मातृभाषा को सर्वोच्च स्थान पर लाने के लिए गर्व के भाव के साथ व्यवहार में लाना होगा। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में विभिन्न सत्रों में भारतीय भाषाओं से जुड़े विविध विषयों पर विस्तृत विचार मंथन होगा और इस वैचारिक महाकुंभ से निकलने वाला अमृत भारत की भाषाई सौहार्दता में अपनी भूमिका सुनिश्चित करेगा। उच्च शिक्षा मंत्री ने रवीन्द्र भवन परिसर में, देश में विगत 100 वर्षों घटित प्रमुख घटनाओं पर विभिन्न समाचार पत्रों में तत्समय प्रकाशित समाचारों के संकलन पर आधारित प्रदर्शनी “सदी साक्षी है : 100 साल, 100 सुर्खियां” “कलम के सिपाही” का अवलोकन भी किया। उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शनी को विश्वविद्यालयों में भी स्थापित करेंगे, इससे विद्यार्थियों को भारतीय इतिहास से अवगत होने का अवसर मिलेगा। गुजरात साहित्य अकादमी अहमदाबाद के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री विष्णु पंड्या ने कहा कि भाषा, अभिव्यक्ति के माध्यम से परे एक कीर्तिमान शिखर है। यह प्रभाव तक ही सीमित नहीं है, भाषा बहती धारा है। हिंदी भाषा की भी इस प्रवाह में रूपांतर यात्रा है। हिंदी भाषा की अलग-अलग जगह यात्रा जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि हिंदी के गौरव को प्रतिष्ठापित करने के लिए व्यापक चिंतन आवश्यक है। श्री पंड्या ने कहा कि भाषा, व्यवहार की पगडंडी से परमात्मा तक पहुंचने का माध्यम है। पंड्या ने हिंदी भाषा एवं भारतीय भाषाओं को लेकर राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश, देश भर में सभी प्रदेशों के लिए आदर्श रूप में अभिप्रेरणा बन रहा है। सप्रे संग्रहालय के संस्थापक श्री विजयदत्त श्रीधर ने दो दिवसीय कार्यक्रम की परिकल्पना पर प्रकाश डालते हुए प्रस्तावना प्रस्तुत की। श्री अजय बोकिल ने मंच संचालन किया एवं आचार्य श्री प्रभु दयाल मिश्र ने आभार जताया।

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