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Rajasthan News लुप्त होती हुई संस्कृति को बचाने का प्रयास करते हूये उम्मेद भाया, नवीन पंडित जी, हरिओम सिंह, राजवीर सिंह, मुकेश सिंह चौहान वह उनकी टीम

रिपोर्टर कृष्ण सिंह कुतीना अलवर राजस्थान 

भारतीय संस्कृति में त्योहार एवं उत्सवों का आदिकाल से ही विशेष महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है कि यहां पर मनाए जाने वाले सभी त्योहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित कर प्रकृति के सान्निध्य में लोगों में प्रेम, एकता, सद्भाव को बढ़ाते हैं। यही कारण है कि भारत में मनाए जाने वाले त्योहारों और उत्सवों में सभी धर्मों के लोग आदर के साथ मिलजुल कर मनाते रहे हैं। लेकिन बदले समय के अनुसार स्थिति में काफी परिवर्तन हुए हैं। लोग अपनी संस्कृति से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। होली पर्व के नाम से ही लोगों में नई खुशियों का संचार हो उठता हैं। लोग अपने स्तर से होली मनाने की तैयारी में जुट जाते हैं। लेकिन बदलते समय पर गौर करें तो पहले की होली और अबकी होली में काफी अंतर देखने को मिलता है। क्षेत्र के कई लोगों ने बताया कि होली में जो उमंग, उल्लास, सद्भाव और होली मनाने के पारंपरिक गुण पहले जमाने में थे वो आज के समय में नहीं दिखता। 80 वर्षीय हरिओम सिंह कहते है कि पुराने जमाने की अपेक्षा आज का परि²श्य बदल चुका है। बदलते समय और आधुनिकता के साथ-साथ होली मनाना का तरीका भी बदलता जा रहा है। जहां एक समय पर लोग ढोल -नगाड़े की धुन पर नाचा करते थे तो अब लोग डीजे की धुन पर हरियाणवी फूहड़ गाने पर लोग थिरक है। पहले बांस की बनी पिचकारी से लोग एक दूसरे को रंग से सराबोर कर देते थे। अब तो ज्यादातर लोग रंग खेलने से परहेज करते हैं। लोगों का मानना था कि रंग खेलने से चेचक जैसी बीमारी से बचा जा सकता है। पहले के समय में लोग होली वाले दिन घर-घर जाकर बधाई देते थे पर अब यह परंपरा थोड़ी दूरी में पहुंच कर सिमट चुकी है। न लोगों में ऐसी उमंग रही और न ही समाज को एक धागे में पिरोने की शक्ति। नतीजा एकता और भाईचारा का पर्व कहा जाने वाला होली भी बेरंग हो गया हैं। प्रणव गुप्ता कहते हैं कि होली मस्ती, खुशी, मिलन, उमंग का त्योहार माना जाता है। इस दिन सभी मस्ती के रंग में डूबे होते है। होली पर अक्सर लोग भांग-ठंडाई पीते है पर अब यह ठंडाई नशेबाजी बन गई है। लोग नशे में आकर चौक-चौराहों पर हुड़दंग मचाते है जिस वजह से कई लोग घर से बाहर निकलना पसंद नहीं करते है। रंग-अबीर से ओतप्रोत लोग एक दूसरे से गले मिलते थे।

अपने से बड़ों का आशीर्वाद लेते थे। घर-घर जाकर शुभकामनाएं दी जाती थी। अब तो लोग गुलाल लेकर दरवाजे पर भी नहीं बैठते। लोगों को पहल करने की जरूरत ताकि समाज का बिखराव न हो सकें और पर्व का आनंद मिलजुलकर मनाया जाए। उम्मेद भाया ने बताया कि पहले के समय में लोग घर पर ही गुलाल बनाकर होली खेला करते थे। बदलते समय के साथ रासायनिक रंगों ने होली पर कब्जा कर लिया था, पर डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्य परामर्शो के रासायनिक रंगों का चेहरे व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताने के बाद लोग खुद ही धीरे-धीरे रासायनिक रंग से दूर हो गए। अब बाजार में हर्बल रंग आने लगे है जिसका ज्यादा से ज्यादा लोग उपयोग कर रहे है, जो स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है। नवीन पंडित जी कहते हैं कि फागुन गाने वालों की टोलियां अब नहीं दिखतीं। होली के एक महीने पूर्व ही मंदिरों में बैठकर फाग गीत गाए जाते थे। फाग गीत सुनकर लोगों को लगता था कि इस बार की होली शानदार होगी। ढोलक की थाप पर लोग झूमने पर मजबूर हो जाते थे। अब वैसा माहौल नहीं है। माह भर पहले से ही होली की तैयारी में लोग जुट जाते थे। जिस दिन धुलंडी होती थी उस दिन रंग नहीं मिला तो कीचड़ और पानी से होली खेली जाती थी। बड़ा आनंद आता था। फागुन गीत गाने वालों की टोलियां कई दिनों पहले से ही लय में आ जाती थी। आज की होली और उस जमाने की होली में बड़ा अंतर था। अब लोग अपनी सभ्यता-संस्कृति तथा पौराणिक परंपरा से दूर होते जा रहे हैं। आधुनिकता की इस अंधी दौर में त्योहारों पर ग्रहण लगा हीं साथ हीं सामाजिक समरसता, भाईचारा, अपनापन, पौराणिक परंपराएं आदि को भी बदल कर रख दिया है। इधर बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों ने बताया कि हमारी सभ्यता संस्कृति को दूसरे देश के लोग अपना रहे हैं। युवा पीढ़ी को इस ओर लौटने की जरूरत हैं।

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