Uttar Pradesh News : कागजों से लेकर बच्चों की सुरक्षा तक सबकुछ संदेह के घेरे में आरटीओ की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

ब्यूरो प्रमुख शरद कुमार फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
फतेहपुर। जनपद में स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। केंद्रीय विद्यालय में बच्चों को ढोने वाली कुछ बसों के संचालन को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि कई वाहनों के दस्तावेज, परमिट और सुरक्षा मानकों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, इसके बावजूद बसें लगातार सड़कों पर दौड़ रही हैं।मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि स्कूली बसों की नियमित जांच होती है तो फिर नियमों की अनदेखी के आरोप आखिर क्यों सामने आ रहे हैं? क्या जांच सिर्फ कागजों तक सीमित है या वास्तव में बसों के अंदर जाकर बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था देखी जाती है?स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कुछ बस संचालकों और परिवहन विभाग से जुड़े एक कर्मचारी के बीच कथित नजदीकी के कारण कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि बस संचालकों के साथ कथित रूप से एक “सिस्टम” बना हुआ है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
अगर बसें नियम विरुद्ध हैं तो कार्रवाई कौन रोके हुए है?सूत्रों के अनुसार कुछ बसों को परिवहन विभाग द्वारा चेक किए जाने के बावजूद कथित तौर पर कार्रवाई किए बिना छोड़ दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जांच के दौरान क्या-क्या कमियां मिलीं और यदि कमियां मिलीं तो उनका चालान अथवा परमिट संबंधी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?स्कूली बसों में बच्चों की सुरक्षा के लिए निर्धारित मानकों का पालन होना अनिवार्य है। बस में फायर एक्सटिंग्विशर, प्राथमिक उपचार बॉक्स,आपातकालीन निकास, सुरक्षित दरवाजे, निर्धारित क्षमता, वैध फिटनेस, परमिट, बीमा और चालक के वैध दस्तावेज जैसी व्यवस्थाओं की जांच जरूरी है। यदि इनमें से किसी भी व्यवस्था में कमी है तो मामला महज परिवहन नियमों का नहीं बल्कि सीधे बच्चों की जान की सुरक्षा से जुड़ जाता है।पहले हादसे के बाद भी नहीं चेता विभाग?कुछ दिन पूर्व एक वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना के बाद भी स्कूली वाहनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठे थे। घटना के बाद उम्मीद थी कि परिवहन विभाग अभियान चलाकर सभी विद्यालयी वाहनों की सघन जांच करेगा, लेकिन आरोप है कि स्थिति में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है ऐसे में अभिभावकों के बीच भी चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। जिस बस में उनका बच्चा प्रतिदिन विद्यालय जाता है, वह सड़क पर चलने के योग्य है या नहीं, उसका परमिट और फिटनेस वैध है या नहीं और उसमें सभी सुरक्षा उपकरण मौजूद हैं या नहीं यह जानने का अधिकार अभिभावकों को है।
आरटीओ कार्यालय से संपर्क का प्रयास, मोबाइल बंद बतायागयामामले में परिवहन विभाग का पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संबंधित मोबाइल नंबर बंद बताया गया। विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद उसे भी खबर में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए। क्योंकि सवाल किसी एक बस या व्यक्ति का नहीं, बल्कि सैकड़ों स्कूली बच्चों की सुरक्षा का है।उच्चस्तरीय जांच हुई तो खुल सकती है पूरी तस्वीरस्थानीय लोगों की मांग है कि केंद्रीय विद्यालय में संचालित सभी बसों की एक साथ जांच कराई जाए। प्रत्येक वाहन के परमिट, फिटनेस, बीमा, प्रदूषण प्रमाणपत्र, चालक का लाइसेंस, चालक का पुलिस सत्यापन, वाहन की निर्धारित क्षमता और सुरक्षा उपकरणों की मौके पर जांच हो।इसके साथ ही यह भी जांच हो कि पूर्व में जिन बसों की जांच की गई, उनमें क्या कमियां मिली थीं और उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई। यदि किसी कर्मचारी द्वारा नियमों की अनदेखी कर बस संचालकों को कथित संरक्षण दिए बच्चों की जिंदगी पर नहीं चल सकता कोई “सिस्टम”सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो जांच से किसी को डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि नियमों को ताक पर रखकर बसें संचालित हो रही हैं और किसी स्तर पर संरक्षण या लापरवाही की बात सही साबित होती है तो यह बेहद गंभीर मामला होगा।अब निगाहें आरटीओ विभाग और जिला प्रशासन पर हैं कि वे इनआरोपों को महज शिकायत मानकर छोड़ते हैं या फिर केंद्रीय विद्यालय की सभी बसों की विशेष जांच कराकर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करते हैं। बच्चों की सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य में भारी पड़ सकती है।


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