Uttar Pradesh News नायब तहसीलदार गाजीपुर के मनमानी आदेशों पर उठ रहें सवाल !
अवैधानिक आदेश पारित किए गयें मामलों मे होनीं चाहिए समीक्षा! नामान्तरण वाद के एक मामलें मे दिया गया विवादास्पद आदेश पर उठ रहें सवाल!

ब्यूरो प्रमुख शरद कुमार फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
फतेहपुर।नायब तहसीलदार राकेश कुमार वर्मा के आदेश में नामान्तरण के मामले में मनमानी के आरोप सवाल खडा कर रहे है।एक मामलें मे वाद सख्या 24416/2025 उषा सिंह बनाम सम्पत देबी उ०प्र० राजस्व सहिता 2006धारा 34 के अन्तिम आदेश मे तो ऐसा बताया जा रहा है कि एक ही प्रकार की चौहद्दी दर्शायी गई है।जिसके कारण वादिनी एवं आपत्तिकर्तागणों के मध्य विवादित गाटा में कब्जें को लेकर “भविष्य में विवाद की सम्भावना की स्थित को बताया गया है”। इसके आलावा भूमि विवाद के सम्बन्ध मे सिविल जज जूनियर डिविजन फतेहपुर में वाद संख्या 1051/2025 सुशील कुमार आदि बनाम उषा सिंह के मध्य वाद विचाराधीन चलने का हवाला दिया गया है।ऐसी स्थित में वादिनी द्वारा प्रस्तुत नामान्तरण वाद पोषनीय न होने के कारण निरस्त किया जाना उचित एवं न्याय संगत प्रतीत होना बताया गया है!जो कि नामान्तरण वाद खारिज करते हुए विपक्षियों के ही नाम बनाए रखनें के आदेश दिए गये है।यदि ईसी प्रकार से वादिनी अथवा विपक्षी राजस्व परिषद अथवा अन्य उच्च अदालतों का न्याय के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाए तो क्या इसी प्रकार विवादास्पद (नायब तहसीलदार गाजीपुर के आदेश की तरह)भी कर देगी…?
स्थगन (स्टे) आदेश पर ही कोई रोक लग सकती है।जोकि नायब तहसीलदार गाजीपुर राकेश कुमार वर्मा के हाल ही लिए दिए फैसले लिए कोई मायनें नहीं रखी है।
वहीं दूसरे मामले के वाद सख्या 7584/2021 मनोज कुमार बनाम गया प्रसाद आदि उ०प्र० राजस्व संहिता 2006 धारा 34/35 के मामले मे अंन्तिम आदेश मे लगातार तहसील प्रशासन पर सवाल खडें हो रहे है।रजिटर्ड वसीयत होने के बावजूद साठगांठ व लेनदेन कर वादी का वाद खारिज करने के आरोपों से घिरे है।जिसमे बताया गया कि आपात्तिकर्ता गणों के हक में आदेश कर दिया गया।जिसमे धारा 5 का(मियाद अधिनियम,जिसमे उचित कारण बताना होता है) देने का उल्लेख किया गया है। लेकिन यह वसीयत के मामलें मे जरूरी नहीं,क्योकि वसीयत कर्ता के मृत्यु के बाद लागू होती है।मरनें के पहलें वसीयत कर्ता खुद मालिक होता है। जब कि नायब तहसीलदार गाजीपुर में मनमानी ढंग से फैसले लिए गये है।इनकें कार्यालय में एक बिचौलिए के जरिये पूरा न्यायालय चलाए जाने के आरोप लग रहे है।जबकि पेशकार बना रहता है काठ का उल्लू। लगातार शासन की ओर से बिचौलियों के सरकारी दफ्तरों में कार्य के लिए सक्त रोक है।फिर भी बिचौलिए के तहसील में कार्य करने समय समय पर आरोप प्रत्यारोप लग रहे है। जहाँ तहसील प्रशासन के न्यायालय के न्याय की गरिमा को तार-तार कर रहे है।वहीं जब से नायब तहसील गाजीपुर की खबरें चल रहीं है तब से बिचौलिया गोरें सिंह पूरी तरह से भूमिगत हो गया है। हाल ही मे नवाईत बदलना और अमल दरामद और राजस्व परिषद के स्थागन आदेश की धज्जियां उडाई गई थी।जिससे माँमला सुर्खियों मे आया था।एक ही दिन में आदेश और अमल दरामद दोनों कटघरें मे खडा कर रहा है। जब कि किसी भी जमीन का बैनामा पहला औरव वसीयत नामा(रजिस्टर्ड हो)लास्ट अन्तिम ही मान्य होती है।




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