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Chhattisgarh News प्रदेशभर में शाला प्रवेश उत्सव के साथ नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन महासमुंद जिले के कई सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़

महासमुंद। प्रदेशभर में शाला प्रवेश उत्सव के साथ नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन महासमुंद जिले के कई सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। जर्जर भवनों, टूटी छतों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच हजारों छात्र पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कई स्कूल ऐसे हैं, जहां बच्चों की सुरक्षा भी खतरे में है। जिले में कक्षा पहली से बारहवीं तक के लिए कुल 1,956 शासकीय स्कूल संचालित हैं। इनमें 1 लाख 41 हजार से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं। इनमें से 54 स्कूल पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं और उपयोग के योग्य नहीं बचे हैं। वर्ष 2025 में प्रशासन ने 113 स्कूलों की मरम्मत के लिए 96.39 लाख रुपये स्वीकृत किए थे और तीन माह में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन नौ माह बाद भी केवल 16 स्कूलों में ही मरम्मत कार्य पूरा हो सका है। शेष 97 स्कूलों में काम या तो अधूरा है या शुरू ही नहीं हुआ है। बागबाहरा ब्लॉक के भदरसी प्राथमिक शाला और मुनगाशेर पूर्व माध्यमिक शाला में वर्षों से अतिरिक्त कक्ष में पढ़ाई कराई जा रही है। वहीं मोंगरापाली-रेवा के पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शौचालय, बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। यहां भवन की छत जर्जर है और कई छात्र जमीन पर बैठकर पढ़ाई करने को विवश हैं। गांव के हाई स्कूल की हालत भी खस्ताहाल है।

छात्रों का कहना है कि बरसात के दिनों में दीवारों में करंट आने का खतरा बना रहता है। खिड़कियां और दरवाजे टूट चुके हैं, जिससे बारिश का पानी सीधे कक्षाओं में भर जाता है। कई वर्षों से नई बिल्डिंग की मांग के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। मोंगरापाली-रेवा के सरपंच खेमराज सिंह का कहना है कि कई बार प्रस्ताव और एस्टीमेट भेजे गए, लेकिन विभाग और शासन की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसी प्रकार की दुर्घटना होती है तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी बी.एल. देवांगन का कहना है कि जर्जर भवनों में कक्षाएं संचालित नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत पड़ने पर पंचायत भवन या दो पालियों में स्कूल संचालित करने की व्यवस्था की जा रही है। हालांकि, स्वीकृत राशि मिलने के बावजूद मरम्मत कार्यों की धीमी गति शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। ऐसे में “स्कूल आ पढ़े बर, जिनगी ला गढ़े बर” का नारा जमीनी हकीकत से कितना मेल खाता है, यह बड़ा सवाल बन गया है।

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