Madhya Pradesh News विश्व पर्यावरण दिवस पर कान्हा टाईगर रिजर्व में कार्यशाला वन्यजीव संरक्षण पर हुआ जनसंवाद, पौधरोपण भी किया गया

ब्यूरो चीफ इंद्र मेन मार्को मंडला मध्यप्रदेश
मंडला। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देश के प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में शामिल कान्हा टाइगर रिजर्व में कार्यशाला का आयोजन किया गया। खटिया स्थित इको सेंटर में आयोजित इस कार्यशाला में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया जगत के पत्रकारों ने सहभागिता दर्ज कराते हुए वन्यजीव संरक्षण पर्यावरण सुरक्षा और जन-जागरूकता के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञ एवं वन अधिकारियों के साथ विस्तृत संवाद किया। कार्यक्रम में अधिकारियों ने वन्यजीव प्रबंधन की आधुनिक तकनीक बाघों एवं अन्य वन्यजीवों की गणना की वैज्ञानिक पद्धति रेस्क्यू एवं जांच प्रोटोकॉल तथा वन्यजीवों में फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम संबंधी जानकारी साझा की। कार्यक्रम में कान्हा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रविन्द्र मणि त्रिपाठी, उप संचालक (कोर) प्रकाश कुमार वर्मा, सहायक संचालक आशीष पाण्डेय, परिक्षेत्र अधिकारी सौरभचौबे, फील्ड बायोलॉजिस्ट अजिनक्या देशमुख सहित विभाग के अनेक अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यशाला का उद्देश्य मीडिया और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा संरक्षण संबंधी विषयों को समाज तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए साझा रणनीति विकसित करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ कान्हा टाइगर रिजर्व के संस्थापक और पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय एच. एस. पवार को श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया। उपस्थित अधिकारी और पत्रकारों ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन किया। अधिकारियों ने कहा कि कान्हा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में स्व. पवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके प्रयासों के कारण ही कान्हा आज देश के सर्वश्रेष्ठ संरक्षित वन क्षेत्रों में गिना जाता है। श्रृद्धांजलि कार्यक्रम के पश्चात पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए पत्रकारों एवं वन अधिकारियों ने संयुक्त रूप से पौधरोपण किया। सभी ने पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प भी लिया। कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए क्षेत्र संचालक रविन्द्र मणि त्रिपाठी ने कान्हा टाइगर रिजर्व में संचालित विभित्र संरक्षण गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। मीडिया इस दिशा में सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के माध्यम से वन्यजीवों और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।

यदि समाज को सही जानकारी मिलेगी तो संरक्षण के प्रयासों को व्यापक जनसमर्थन भी प्राप्त होगा। उन्होंने मीडिया प्रतिनिधियों से तथ्यपरक और सकारात्मक रिपोर्टिंग के माध्यम से संरक्षण अभियान को मजबूत करने का आह्वान किया। उप संचालक प्रकाश कुमार वर्मा ने कान्हा में संचालित अनुश्रवण गतिविधियों और सुरक्षा व्यवस्था के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीकों की सहायता से वन्यजीवों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाती है। जंगलों में गश्त, कैमरा ट्रैप नेटवर्क, जीपीएस आधारित निगरानी और फील्ड स्टाफ की सक्रियता से वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। उन्होंने पत्रकारों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों का उत्तर देते हुए बताया कि वन विभाग लगातार नए नवाचारों को अपना कर संरक्षण कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और जनसहयोग संरक्षण की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। कार्यशाला के दौरान सहायक संचालक आशीष पाण्डेय ने वन्यजीवों विशेषकर बाघ और तेंदुए की मृत्यु होने की स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण एनटीसीए द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रत्येक मामले की गंभीरता से जांच की जाती है। उन्होंने बताया कि किसी भी वन्यजीव की मृत्यु की सूचना मिलते ही घटनास्थल को सुरक्षित किया जाता है विशेषज्ञों की उपस्थिति में पोस्टमार्टम किया जाता है तथा पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाती है।

इसके बाद निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य पारदर्शिता बनाए रखना और मृत्यु के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होता है। फील्ड बायोलॉजिस्ट अजिनक्या देशमुख ने तकनीकी प्रस्तुतीकरण के माध्यम से वन्यजीव आकलन की आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में कैमरा ट्रैप, डेटा विश्लेषण, जीआईएस तकनीक और वैज्ञानिक सर्वेक्षण विधियों के माध्यम से वन्यजीवों की गणना की जाती है। उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार प्रत्येक बाघ की धारियों का पैटर्न अलग होता है और कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर उनकी पहचान की जाती है। इसके अलावा शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या उनके आवास और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति का भी नियमित अध्ययन किया जाता है। पत्रकारों ने इस तकनीकी प्रस्तुतीकरण में विशेष रुचि दिखाई और अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। कार्यशाला का एक महत्वपूर्ण विषय वन्यजीवों में फैलने वाले केनाइन डिस्टेंपर वायरस सीडीवी संक्रमण को लेकर रहा। क्षेत्र संचालक रविन्द्र मणि त्रिपाठी एवं उप संचालक प्रकाश कुमार वर्मा ने पत्रकारों को इस संक्रमण के बारे में विस्तृत जानकारी दी। कार्यशाला के दौरान आयोजित खुले संवाद सत्र में पत्रकारों और वन अधिकारियों के बीच सकारात्मक चर्चा हुई।



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