Chhattisgarh कनकी हसदेव पुल टूटा, रोजाना लाखों लीटर ईंधन की बर्बादी जनप्रतिनिधियों की प्रतीकात्मक बचत बनाम जमीनी हकीकत पर उठे सवाल

रिपोर्टर मनोज मानिकपुरी कोरबा छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ महतारी की जय के उद्घोष के साथ आम नागरिकों ने देशहित में ईंधन बचत की आवश्यकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। देश के प्रधानमंत्री द्वारा डीजल-पेट्रोल बचाने की अपील के बाद कई जनप्रतिनिधियों द्वारा कम वाहनों के उपयोग का प्रदर्शन किया जा रहा है, लेकिन कोरबा जिले की जमीनी स्थिति इस संदेश के विपरीत नजर आ रही है।
कोरबा जिले का कनकी हसदेव ब्रिज पिछले लगभग एक वर्ष से क्षतिग्रस्त होने के कारण बंद पड़ा है। यह पुल क्षेत्र की परिवहन व्यवस्था की मुख्य जीवनरेखा माना जाता था, जहां से प्रतिदिन लगभग 3000 ट्रांसपोर्ट वाहन आवागमन करते थे।
30 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी से बढ़ा बोझ
पुल बंद होने के कारण अब उन्हीं वाहनों को रोजाना लगभग 30 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। इससे न केवल समय और लागत बढ़ी है बल्कि ईंधन की भारी बर्बादी भी हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार —
प्रतिदिन वाहन संख्या : 3000
प्रति वाहन अतिरिक्त ईंधन खपत : 15 लीटर
कुल अतिरिक्त खपत : 45,000 लीटर प्रतिदिन
यदि औसत मूल्य के आधार पर गणना की जाए तो लगभग ₹41,85,000 प्रतिदिन का आर्थिक नुकसान हो रहा है।
एक वर्ष में करोड़ों की राष्ट्रीय हानि
लगातार एक वर्ष से पुल निर्माण लंबित रहने के कारण कुल अनुमानित नुकसान लगभग
👉 ₹1,52,75,25,000 (एक अरब बावन करोड़ पचहत्तर लाख पच्चीस हजार रुपये)
तक पहुंच चुका है।
यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय भी है, क्योंकि अतिरिक्त ईंधन खपत से प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ रहा है।
प्रतीकात्मक बचत बनाम वास्तविक समाधान
स्थानीय नागरिकों और परिवहन व्यवसायियों का कहना है कि जहां एक ओर नेता और जनप्रतिनिधि ईंधन बचत के प्रतीकात्मक संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक महत्वपूर्ण पुल का समय पर निर्माण न होना सरकारी प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
लोगों का मानना है कि —
“जितनी बचत पूरे प्रदेश के मंत्री मिलकर दिखावे में करने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी बचत सिर्फ एक पुल के निर्माण से संभव है।”
जनता की मांग
कनकी हसदेव पुल का त्वरित पुनर्निर्माण
परिवहन मार्ग की स्थायी व्यवस्था
ईंधन बचत को केवल संदेश नहीं, बल्कि नीति स्तर पर लागू किया जाए




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