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Madhya Pradesh News : सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र – केन-बेतवा लिंक परियोजना को घातक बता, सुझाया विकल्प

“बुंदेलखंड को जल संकट पर छलावा नहीं, टिकाऊ समाधान चाहिए” – अमित भटनागर

ब्यूरो चीफ राजू जोशी महाराज छतरपुर मध्य प्रदेश

विकल्प से “बिना पर्यावरणीय, सामाजिक और मानवीय क्षति के 10 गुना फायदा संभव” बिजवार, छतरपुर, बुंदेलखंड, बुंदेलखंड क्षेत्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को एक विस्तृत और तथ्यात्मक पत्र लिखा है, जिसमें केन-बेतवा लिंक परियोजना को न केवल पर्यावरणीय और मानवीय दृष्टिकोण से घातक बताया गया है, बल्कि इसके स्थान पर स्थायी, किफायती और प्रभावी विकल्प भी सुझाए गए हैं।


पत्र की शुरुआत में श्री भटनागर ने प्रधानमंत्री जी द्वारा बुंदेलखंड की जल समस्या की ओर ध्यान देने और समाधान की मंशा के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि –
“हम आपके आभारी हैं कि आपने बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या – जल संकट – को गंभीरता से लिया, लेकिन केन-बेतवा लिंक परियोजना के माध्यम से जिस समाधान की बात की जा रही है, वह वास्तव में एक भ्रम और विनाश का मार्ग है।”
केन-बेतवा परियोजना पर उठाई गंभीर आपत्तियां:
यह परियोजना बुंदेलखंड को लाभ नहीं, बल्कि जल का निर्यात करेगी, जिससे स्थानीय जल संकट और गहरा जाएगा।
46 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई, पन्ना रिजर्व टाईगर जिसमे वन्यजीवों के आवासों का विनाश, और प्राकृतिक धरोहरों का जलमग्न होना इस परियोजना के साथ जुड़ा है। जो बुंदेलखंड मे गंभीर होते जलवायु परिवर्तन और और गंभीर करेगा|
यह विस्थापन प्रमुख रूप से बुंदेलखंड के आदिवासी बाहुल्य गांवों को प्रभावित करता है, जबकि इस क्षेत्र में आदिवासियों की जनसंख्या पहले से ही सीमित है। इससे इनकी पारंपरिक संस्कृति, जीवन शैली और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा आघात पहुंचेगा।
परियोजना क्षेत्र में स्थित पाषाण कालीन शैलचित्र जो हमारी सभ्यता के प्राचीनतम चिन्हों में आते हैं – भी खतरे में हैं। इनका नाश मानव इतिहास की अमूल्य विरासत का विनाश होगा।
आदिवासी क्षेत्रों में फर्जी ग्राम सभाओं के ज़रिए PESA और LARR जैसे कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई गईं, सर्वे कार्य मनमानी पूर्ण किया गया।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में गंभीर खामियां और CEC रिपोर्ट की अनदेखी की गई।
परियोजना की लागत 44,605 करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि इससे कहीं कम खर्च में दस गुना स्थायी लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
सुझाए गए समाधान – बुंदेलखंड की मिट्टी से निकला रास्ता:
अमित भटनागर ने पत्र में कहा कि बुंदेलखंड की जल समस्या का हल आधुनिक नदी जोड़ योजनाओं में नहीं, बल्कि हमारे इतिहास और परंपराओं में छिपा है।
चन्देलकालीन तालाब, बावड़ी, जलाशय और नदी, नालों की मरम्मत और पुनर्जीवन से स्थानीय जल संरक्षण हो सकता है।
खेत का पानी खेत मे रोकने, चेक डैम, रिचार्ज स्ट्रक्चर और सौर पंप आधारित सिस्टम से भूजल स्तर को स्थायी रूप से बढ़ाया जा सकता है।
इन उपायों से स्थानीय रोजगार, पर्यावरण की रक्षा और सामाजिक संतुलन भी संभव है।
“जल संकट का समाधान हमें अपने अतीत से मिलेगा – जहां प्रकृति और मानव साथ जीते थे। केन-बेतवा परियोजना केवल पानी नहीं बहाएगी, वह हमारी संस्कृति, प्रकृति और भविष्य को भी बहा ले जाएगी।” – अमित भटनागर
प्रमुख मांगे:
परियोजना पर तत्काल रोक लगाई जाए जब तक सर्वोच्च न्यायालय और एनजीटी की प्रक्रिया पूरी न हो।
जलविज्ञान के आंकड़ों की स्वतंत्र समीक्षा की जाए और सार्वजनिक किया जाए।
ग्राम सभाएं पुनः और पारदर्शिता से आयोजित की जाएं।
परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का पुनर्मूल्यांकन कराया जाए।
पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर एक स्थायी समाधान अपनाया जाए।
अमित भटनागर ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि इस परियोजना को रोक कर, समावेशी संवाद और विशेषज्ञ समिति के माध्यम से एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जाए। उन्होंने कहा:
“हम विरोध नहीं करना चाहते। लेकिन यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं, कानून और नागरिक अधिकारों की अनदेखी करते हुए भय और बलपूर्वक यह परियोजना थोपी जाती है, तो हम लोकतांत्रिक तरीके से विरोध और जनजागरण करने को बाध्य होंगे। यह विरोध विकास का नहीं, विनाश की उस राह का होगा जो हमारी धरती, समाज और भविष्य को अंधकार में ले जा रही है।”
अंत में, भटनागर ने कहा कि यदि सरकार इस पारंपरिक और पर्यावरण-सम्मत दृष्टिकोण को अपनाती है, तो आने वाली पीढ़ियाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक दूरदर्शी, प्रकृति-सम्मत और जनहितैषी नेता के रूप में याद रखेंगी

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