
रिपोर्टर विकास शर्मा नीमकाथाना राजस्थान
शीतलाष्टमी के दिन मुख्य रूप से माता को चावल और घी का भोग लगाया जाता है और कुछ जगहों पर गुड़ व चावल का बने पकवान का भोग लगाते हैं। मगर चावल को उस दिन नहीं पकाया जाता बल्कि एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को ही खाना बनाकर रख लिया जाता है। बसौड़ा वाले दिन परिवार के सभी लोग बासी खाना ही खाते हैं क्योंकि इस पर्व के बाद तेज गर्मी पड़ने लगती है और ग्रीष्मकाल में शीतल भोजन ही स्वस्थ रहने का मुख्य जरिया होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो गरमी के दिनों में खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इन दिनों मौसमी बीमारियों का खतरा बना रहता है। इन बीमारियों से निजात के लिए केवल ठंडा खाना ही फायदेमंद रहता है। साथ ही गर्मी में ठंडा भोजन करने से पाचन तंत्र और पेट के को काफी लाभ मिलता है।
मान्यता है कि इस पर्व को मनाने पर चिकन पॉक्स, दाह ज्वर, चेचक, पीतज्वर, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्र विकार और खसरा आदि रोग शीतला माता के आशीर्वाद से ठीक हो जाते हैं। होली के आठ दिन बाद शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। शीतला माता की पूजा करने से ग्रीष्मकाल में होने वाले सभी रोग दूर हो जाते हैं। शीतला माता का स्वरूप काफी मनमोहक है।



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