धर्मराजस्थान

Rajasthan News भजन करो उस रब का, जो दाता है कुल सब का

सूक्ष्मवेद में कहा कि

रिपोर्टर मीना देवी सतलोक आश्रम सोजत पाली राजस्थान।

श्रीमद् भगवत् गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16.17 में कहा है कि यह संसार ऐसा है जैसे पीपल का वृक्ष है। जो संत इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष की मूल (जड़ों) से लेकर तीनों गुणों रूपी शाखाओं तक सर्वांग भिन्न-भिन्न बता देता है। (सः वेद वित्) वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है अर्थात् वह तत्वदर्शी सन्त है। अपने द्वारा रची सृष्टि का ज्ञान तथा वास्तविक आध्यात्म ज्ञान परमात्मा स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने मुख कमल से सुनाता है। प्रमाण के लिए पढ़ें निम्न वेद मंत्र। इन मंत्रों की फोटोकापी कृप्या देखें पुस्तक ‘‘गीता तेरा ज्ञान अमृत‘‘ में जिनका अनुवाद आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद तथा उसके अनुयाईयों ने किया है। उसकी त्राुटियाँ लेखक (संत रामपाल दास) ने शुद्ध की हैं।ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मन्त्र 26-27, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 82 मन्त्र 1-2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 96 मन्त्र 16 से 20, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 94 मन्त्र 1, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मन्त्र 2, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3, ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मन्त्र 1 में प्रमाण है कि जो सर्व ब्रह्माण्डों का रचनहार, सर्व का पालनहार परमेश्वर है। वह सर्व भुवनों के ऊपर के लोक में बैठा है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 54 मन्त्र 3) वह परमात्मा वहाँ से गति करके अर्थात् सशरीर चलकर यहाँ पृथ्वी पर आता है, भक्तों के संकटों का नाश करता है। उसका नाम कविर्देव अर्थात् कबीर परमेश्वर है। यहाँ पर अच्छी आत्माओं को मिलता है, उनको तत्वज्ञान अपने मुख कमल से बोलकर बताता है। वह परमात्मा ऊपर के लोक में बैठा है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 86 मन्त्र 26-27, मण्डल 82 मन्त्र 1-2 तथा मण्डल नं. 9 सूक्त 20 मन्त्र 1

परमात्मा पृथ्वी पर कवियों की तरह आचरण करता हुआ विचरण करता है। ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 94 मन्त्र 1

परमात्मा अपने मुख से वाणी बोलकर साधकों को भक्ति करने की प्रेरणा करता है। परमात्मा भक्ति के गुप्त मन्त्रों का आविष्कार करता है। (ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त 95 मन्त्र 2)

परमात्मा तत्वज्ञान को कविर्वाणी (कबीर वाणी) द्वारा लोकोक्तियों, दोहों, चैपाईयों द्वारा बोलकर सुनाता है। वह कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है जो सन्त रूप में प्रकट होता है। उस परमेश्वर द्वारा ऋषि या सन्तों द्वारा रची असँख्यों वाणियाँ जो तत्वज्ञान है, वे उसके अनुयाईयों के लिए अमृत तुल्य आनंददायक होती हैं। वह परमेश्वर प्रसिद्ध कवियों में से भी एक प्रसिद्ध कवि की पदवी भी प्राप्त करते हैं। उनको कवि कहते हैं, परंतु वह परमात्मा होता है। वह परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम (सत्यलोक) में विराजमान है। जैसे मनुष्य अन्य वस्त्रा धारण करता है, ऐसे ही वह परमात्मा भिन्न-भिन्न रूपों में पृथ्वी पर प्रकट होता है। उपरोक्त ऋग्वेद के मन्त्रों से स्पष्ट है कि परमात्मा अपने अमर धाम से चलकर पृथ्वी पर प्रकट होता है। वह अच्छी आत्माओं को मिलता है। वह तत्वदर्शी सन्त की भूमिका करके तत्व ज्ञान दोहों, चैपाईयों, शब्दों द्वारा बोलता है। उस परमेश्वर ने सन् 1398 से 1518 तक 120 वर्ष पृथ्वी पर भारत वर्ष की पावन धरती पर काशी शहर में जुलाहे (धाणक) के रूप में रहकर तत्वज्ञान बताया था।

अक्षर पुरूष एक पेड़ है, क्षर पुरूष वाकी डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।

कबीर वाणी पुस्तक में एक वाणी ऐसे भी लिखी है

अक्षर पुरूष वृक्ष का तना है, क्षर पुरूष है डार। त्रायदेव शाखा भए, पात जानों संसार।

सरलार्थ:- वृक्ष का जो हिस्सा पृथ्वी से बाहर दिखाई देता है। उसकी जानकारी बताई है कि वृक्ष का जो तना होता है, उसे तो “अक्षर पुरूष” जानें। तने के ऊपर कई मोटी डार निकलती हंै, उनमें से एक डार को ‘‘क्षर पुरूष‘‘ जानें। फिर उस डार के मानों तीन शाखा निकली हैं। वे तीनों देवता:- (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) जानें और उन शाखाओं पर लगे पत्ते जीव-जन्तु जानें।

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