Chhattisgarh News सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक मजिस्ट्रेट, जिसने सीआरपीसी की धारा 202(1) के तहत खुद जांच करने का विकल्प चुना था, उसे धारा 203 सीआरपीसी के तहत शिकायत को खारिज करने से पहले शिकायतकर्ता और उसके गवाहों के बयानों पर विचार करना होगा।

रिपोर्टर राकेश कुमार साहू जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़
इस मामले में, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 323, 342, 500, 504, 506, 295-ए, 298, 427 के तहत दंडनीय अपराध का आरोप लगाते हुए एक आरोपी के खिलाफ मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज की गई थी। सबसे पहले, मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 202 की उप-धारा (1) के तहत जांच करने का निर्देश देने वाला आदेश पारित किया।इसके बाद, मजिस्ट्रेट ने केवल शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया और सीआरपीसी की धारा 203 के तहत शिकायत खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने इस बर्खास्तगी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 202(1) के संदर्भ में मजिस्ट्रेट द्वारा कोई उचित जांच नहीं की गई थी और इसलिए सीआरपीसी की धारा 202 के तहत जांच करने के चरण से शिकायत को मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया गया। शीर्ष अदालत के समक्ष अपील में आरोपी ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के लिए अन्य गवाहों के बयान दर्ज करना अनिवार्य नहीं है। यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता के बयान और शिकायत में दिए गए कथनों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्री पर विचार करने के बाद, मजिस्ट्रेट ने सही माना कि शिकायत में लगाए गए आरोप दुर्भावनापूर्ण थे। अदालत ने शिकायत पर गौर करते हुए कहा कि शिकायत में विशेष रूप से आठ गवाहों का नाम दिया गया था और मजिस्ट्रेट ने शिकायत में विशेष रूप से उद्धृत अन्य गवाहों के बयान दर्ज नहीं करने के कारणों को दर्ज नहीं किया है। पीठ ने अपील खारिज करते हुए कहा, “सीआरपीसी की धारा 202 की उप-धारा (1) का सहारा लेने के बाद, सीआरपीसी की धारा 203 का सहारा लेकर शिकायत को खारिज करने से पहले, विद्वान मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और उसके गवाहों के बयानों पर !

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