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Chhattisgarh News सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एफआईआर/आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर विचार करते समय हाईकोर्ट को मामले की शुरुआत/रजिस्ट्रेशन के साथ-साथ जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री की समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखने का अधिकार है।

रिपोर्टर राकेश कुमार साहू जांजगीर चांपा छत्तीसगढ़

जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस जे बी पारदीवाला की पीठ ने कहा,”तुच्छ या परेशान करने वाली कार्यवाहियों में न्यायालय का कर्तव्य है कि वह मामले के रिकॉर्ड से निकली कई अन्य परिस्थितियों पर गौर करे और यदि आवश्यक हो, तो उचित देखभाल और सावधानी के साथ गूढ़ अर्थ निकालने की कोशिश करे। इस मामले में आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 342, 386, 504, 506 के तहत अपराध करने का आरोप लगाते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी शीर्ष अदालत ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि भले ही अभियोजन के पूरे मामले को सच मान लिया जाए या स्वीकार कर लिया जाए, लेकिन कथित तौर पर अपराध का गठन करने वाली किसी भी सामग्री का खुलासा नहीं किया गया है। अदालत ने आगे कहा कि विचाराधीन एफआईआर अपीलकर्ताओं के कथित गैरकानूनी कृत्यों के 14 साल की अवधि के बाद दर्ज की गई थी और एफआईआर में कथित अपराधों की कोई विशिष्ट तारीख या समय का खुलासा नहीं किया गया है। अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि प्रथम सूचनाकर्ता द्वारा पेश किया गया पूरा मामला प्रथम दृष्ट्या मनगढ़ंत प्रतीत होता है। इसके बाद अदालत ने धारा 482 सीआरपीसी क्षेत्राधिकार के दायरे के संबंध में निम्नलिखित टिप्पणी की: “जब भी कोई आरोपी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का उपयोग करके एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को अन !

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