Chhattisgarh News : जशपुर के कांसाबेल में रक्षक बना भक्षक : आदिवासी विधवा से रेप, जबरन अबॉर्शन और ब्लैकमेलिंग के आरोपी आरक्षक रुद्रमणि यादव को हाईकोर्ट से करारा झटका, अग्रिम जमानत याचिका खारिज…
* 'वर्दी के खौफ और कानूनी धौंस से बनी रजामंदी को सहमति नहीं कह सकते' - जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की ऐतिहासिक और तल्ख टिप्पणी...

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
बिलासपुर /जशपुर। खाकी की आड़ में कानून की धज्जियां उड़ाने और एक बेबस महिला की अस्मत से खिलवाड़ करने वाले पुलिसकर्मी को कानून के सबसे बड़े मंदिर से कड़ा सबक मिला है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले के कांसाबेल थाने में पदस्थ दागी आरक्षक रुद्रमणि यादव की अग्रिम जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दो टूक कहा कि पुलिस महकमे के पास राज्य की दी हुई संस्थागत ताकत होती है; ऐसे में कोई भी असहाय पीड़िता कानूनी कार्रवाई के खौफ में आकर घुटने टेक सकती है, जिसे किसी भी हाल में ‘स्वतंत्र सहमति’ का नाम देकर बचाव का जरिया नहीं बनाया जा सकता।
सोशल मीडिया पर बिछाया जाल, फिर वर्दी की हनक में लूटी आबरू – कांसाबेल थाने में तैनात आरक्षक रुद्रमणि यादव की घिनौनी करतूत साल 2023 से शुरू हुई। आरोपी ने फेसबुक के जरिए एक अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की विधवा महिला को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाया। पहले दोस्ती का नाटक रचा और फिर वर्दी का रौब दिखाकर उसके साथ लगातार जबरन शारीरिक संबंध बनाए। जब महिला गर्भवती हो गई, तो आरक्षक ने अपने पद और रसूख का दबाव बनाकर जबरन उसका गर्भपात (अबॉर्शन) करवा दिया। ब्लैकमेलिंग की सारी हदें पार : तस्वीरें वायरल कीं, जमीन के नाम पर ऐंठे ₹2 लाख – पीड़िता ने जब इस हैवानियत का विरोध करना शुरू किया, तो आरक्षक रुद्रमणि यादव ने वर्दीधारी से सीधे शातिर अपराधी का रूप धर लिया :
* निजी तस्वीरें कीं लीक : आरोपी ने महिला को समाज में बदनाम करने की नीयत से उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें रिश्तेदारों और परिचितों के बीच वायरल कर दीं।
* लाखों की ठगी : महिला की मजबूरी का फायदा उठाते हुए आरोपी ने उसे जमीन दिलाने का सब्जबाग दिखाया और ₹2 लाख की मोटी रकम ऐंठ ली।
* धमकी और दहशत : लगातार दी जा रही धमकियों और वर्दी के डर से सहमी पीड़िता लंबे समय तक थाने जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकी।
अदालत में खुली आरोपी की चालाकी, ‘सहमति’ की दलील पर हाईकोर्ट का हथौड़ा – गिरफ्तारी से बचने के लिए आरक्षक रुद्रमणि यादव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और राहत पाने के लिए दलील दी कि :
* दोनों पक्ष बालिग हैं और संबंध आपसी सहमति (Consensual Relationship) से बने थे।
* पीड़िता ने एफआईआर दर्ज कराने में लगभग तीन साल का वक्त लिया, लिहाजा यह केस पूरी तरह झूठा और दुर्भावना से प्रेरित है।
राज्य शासन ने खोली पोल – राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का तीखा विरोध करते हुए कोर्ट के सामने कड़वी हकीकत रखी। उन्होंने कहा कि पीड़िता एक साधनहीन, आदिवासी विधवा महिला है, जबकि आरोपी कानून का रखवाला होकर वर्दी की धौंस दिखा रहा था। एफआईआर में देरी स्वाभाविक थी क्योंकि पीड़िता आरक्षक की वर्दी और उसकी संस्थागत शक्ति के गहरे खौफ में जी रही थी। नजीर बना हाईकोर्ट का कड़ा रुख : अब सलाखों के पीछे जाने की बारी – जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने आरोपी के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एक पुलिसकर्मी के खिलाफ लगातार दुष्कर्म, जबरन गर्भपात, निजी तस्वीरों का प्रसार और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे जघन्य आरोप दर्ज हैं। पीड़िता की सामाजिक स्थिति और पुलिस तंत्र के प्रभाव को देखते हुए आरोपी को किसी भी स्थिति में अग्रिम राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले के बाद अब जशपुर पुलिस पर आरोपी आरक्षक रुद्रमणि यादव को तत्काल गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजने का भारी दबाव बन गया है।



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