Jharkhand News : सिमरिया- पिपरवार सड़क पर हाइवा का आतंक, धूल-धुएं में घुट रही जिंदगी
कोल परियोजना से खुशहाली की उम्मीद थी, मिली बदहाली - जर्जर सड़क और प्रदूषण से लोग बेहाल

रिपोर्टर महेंद्र कुमार यादव चतरा झारखंड
चतरा। कोल परियोजना खुलने से टंडवा समेत अन्य क्षेत्र के विस्थापित- प्रभावित लोगों को खुशहाली के सपने दिखाए गए थे। अच्छी सड़कें, बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, 24 घंटे बिजली और रोजगार के वादे किए गए थे। लेकिन वर्षों बाद हकीकत यह है कि विकास के दावे धूल-धुएं और बदहाली में दब कर रह गए हैं। चतरा जिले के सिमरिया से पिपरवार तक जाने वाली मुख्य सड़क इन दिनों आवागमन का रास्ता नहीं, बल्कि हजारों लोगों के लिए रोज की मुसीबत बन चुकी है। दिन-रात कोयला लदे हाइवा के बेलगाम दौड़ने से सड़क जर्जर हो चुकी है, जगह-जगह डिवाइडर और पुल-पुलिया टूट चुके हैं और उड़ती धूल से पूरी जिंदगी घुट रही है।
परिस्थिति ऐसी है कि सड़क पर धूल की मोटी परत हवा में घुलते ही राहगीरों के चेहरे ढक जाते हैं, सड़क किनारे बसे घरों में धूल घुस जाती है। पर बिंगलात के पास का भयावह दृश्य इसकी गवाही दे रहा है। इसी सड़क से रोज हजारों ग्रामीण, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएं और दोपहिया चालक गुजरते हैं। इसी रास्ते से बड़े प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी आते-जाते हैं, लेकिन बंद गाड़ी के शीशे के पीछे से उन्हें यह धूल-धुंध शायद दिखती ही नहीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। पानी का छिड़काव केवल कागजों पर हो रहा है। फ्लाईएश और कोयला परिवहन से सड़क लगातार टूट रही है। बारिश में कीचड़, गड्ढे और तेज रफ्तार हाइवा के बीच पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, दोपहिया चालक हर पल हादसे के डर में जीते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार आंदोलन, शिकायत और आवाज उठाई गई, पर ठोस बदलाव नहीं हुआ। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब लोग पूछ रहे हैं – जिस सड़क से कोयला ढोकर बड़े आर्थिक हित सध रहे हैं, उसकी कीमत आम ग्रामीण ही क्यों चुकाए? कोयला ढोने वाली गाड़ियां रोज चल सकती हैं, तो टूटी सड़कें क्यों नहीं बन सकतीं? जिम्मेदार तंत्र आखिर कब जागेगा?

Subscribe to my channel