Chhattisgarh News खाकी के अहंकार पर हाईकोर्ट का हथौड़ा; ‘शासकीय कार्य में बाधा’ के नाम पर मीडियाकर्मियों का दमन बर्दाश्त नहीं, 6 साल की देरी पर भड़का न्यायालय

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
बिलासपुर। क्या पुलिस अपनी कमियों को छुपाने के लिए किसी भी नागरिक या मीडियाकर्मी पर ‘शासकीय कार्य में बाधा’ का मुकदमा दर्ज कर उसे सालों-साल प्रताड़ित कर सकती है? क्या ‘जांच चल रही है’ का बहाना बनाकर किसी व्यक्ति के जीवन के कीमती साल कानूनी दांव-पेच में बर्बाद किए जा सकते हैं? इन सुलगते सवालों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है, जो कानून की आड़ में मनमानी करने वाले पुलिस अफसरों के होश ठिकाने लगाने के लिए काफी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने पुलिसिया तंत्र को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट कर दिया है कि “बिना किसी ठोस और वाजिब कारण के जांच और चार्जशीट में 6 साल से अधिक की देरी करना आरोपी को मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले ‘जल्द सुनवाई के अधिकार’ (Right to Speedy Trial) का सीधा और गंभीर उल्लंघन है।” इस बेहद तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायालय ने पीड़ित मीडियाकर्मी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और 6 साल बाद पेश की गई चार्जशीट को जड़ से निरस्त (Quash) कर दिया है। क्या था पूरा मामला? जानिए 2018 के उस ‘पुलिस आंदोलन’ की इनसाइड स्टोरी इस पूरे कानूनी संग्राम की नींव साल 2018 में पड़ी थी। बिलासपुर के सिरगिट्टी इलाके के रहने वाले याचिकाकर्ता कैलाश यादव एक निजी न्यूज चैनल में बतौर वीडियो जर्नलिस्ट (मीडियाकर्मी) कार्यरत हैं। तारीख 20 जून 2018: तत्कालीन समय में छत्तीसगढ़ में पुलिसकर्मियों का एक बड़ा और संवेदनशील आंदोलन चल रहा था। पुलिस महकमे के भीतर असंतोष चरम पर था। इस आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस के आला अधिकारियों ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा दीं। पुलिस अफसरों ने आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नियों और उनके परिजनों को देर रात महिला थाने में लाकर बैठा दिया (डिटेन कर लिया)।
मीडियाकर्मी का धर्म और पुलिस की बौखलाहट: आधी रात को महिलाओं को बिना किसी वैध कारण के पुलिस हिरासत में रखे जाने की खबर जैसे ही खोजी पत्रकार कैलाश यादव को मिली, उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का धर्म निभाया। वे अपनी पूरी कैमरा टीम के साथ ग्राउंड जीरो (महिला थाना) पहुंचे ताकि सच को उजागर किया जा सके। थाने के भीतर जब कैलाश यादव ने जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों से महिलाओं को हिरासत में रखने का कारण पूछा और कैमरे ऑन किए, तो पुलिस अपनी इस अवैध कार्रवाई के बेनकाब होने के डर से पूरी तरह बौखला गई। सहयोग करने या कानूनी प्रक्रिया बताने के बजाय वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने मीडियाकर्मी के साथ घोर बदसलूकी की, कैमरा बंद करने की धमकी दी और अभद्र व्यवहार किया। ’काउंटर ब्लास्ट’ एफआईआर: जब रक्षक ही बन गए भक्षक अपनी नाकामी और आधी रात की अवैध हिरासत वाली बात को दबाने के लिए पुलिस ने वही घिसा-पिटा हथकंडा अपनाया, जो अक्सर सत्ता और वर्दी के नशे में चूर अधिकारी अपनाते हैं “फर्जी काउंटर-ब्लास्ट एफआईआर।” पुलिस ने मीडियाकर्मी कैलाश यादव की आवाज दबाने के लिए उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया: धारा 186 व 353: लोक सेवक के शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाना और हमला करना। धारा 323: मारपीट करना। धारा 34: सामूहिक तौर पर अपराध को अंजाम देना।
इस एफआईआर का एकमात्र मकसद मीडियाकर्मी को डराना, झुकाना और प्रेस की आजादी को बंधक बनाना था। 6 साल तक ‘फाइल’ दबाकर बैठी रही पुलिस; हाईकोर्ट ने पूछा- यह कैसी जांच है? इस फर्जी मुकदमे के खिलाफ कैलाश यादव ने घुटने टेकने के बजाय न्यायपालिका पर भरोसा जताया और हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट ने पुलिस से केस की प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगी, तो खाकी का पूरा झूठ ताश के पत्तों की तरह ढह गया। कोर्ट ने पाया कि घटना जून 2018 की है, जबकि पुलिस ने इस मामले की चार्जशीट नवंबर 2024 में (यानी पूरे 6 साल बाद) कोर्ट में दाखिल की थी। महान्यायालय ने बेहद कड़े लहजे में सरकारी वकील से पूछा कि: “एक साधारण से कथित मारपीट और शासकीय कार्य में बाधा के मामले की जांच करने में पुलिस विभाग को 6 साल क्यों लग गए? इस 6 साल की अकल्पनीय देरी का पुलिस के पास क्या तार्किक जवाब है?”
पुलिस विभाग के पास कोर्ट की इस फटकार का कोई जवाब नहीं था। कोर्ट ने माना कि यह देरी न्याय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि आरोपी को मानसिक रूप से तोड़ने की एक सोची-झीझी साजिश थी। हाईकोर्ट का अंतिम प्रहार: “न कोई स्वतंत्र गवाह, न सबूत… सिर्फ पुलिस की मनगढ़ंत कहानी” सभी पक्षों की दलीलें सुनने, केस डायरी का गहन अवलोकन करने और चार्जशीट की बारीकियों को देखने के बाद डिवीजन बेंच ने पुलिसिया थ्योरी की धज्जियां उड़ा दीं। हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में लिखा: गवाहों पर सवाल: “पूरी केस डायरी और चार्जशीट को देखने से साफ है कि यह पूरा मामला सिर्फ और सिर्फ शिकायतकर्ता पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े हुए विभागीय गवाहों के बयानों पर टिका है। मौके पर एक भी स्वतंत्र (Independent) या बाहरी गवाह मौजूद नहीं था।” बयानों में विरोधाभास: “पुलिसवालों के खुद के बयानों में जमीन-आसमान का अंतर और भारी विरोधाभास है। याचिकाकर्ता मीडियाकर्मी के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध का कोई सीधा या ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है।”
कानून का दुरुपयोग: “ऐसे मनगढ़ंत और बिना सबूत वाले मामले को, जिसमें 6 साल की अकारण देरी की गई हो, आगे बढ़ाना केवल और केवल कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of Law) माना जाएगा।” इस फैसले के दूरगामी मायने: क्यों यह फैसला ऐतिहासिक है? ’शासकीय कार्य में बाधा’ की धारा का दुरुपयोग रुकेगा: अक्सर देखा जाता है कि पुलिस जब भी अपनी किसी गलती पर सवाल उठाने वाले पत्रकार या नागरिक को चुप कराना चाहती है, तो वह धारा 353 (शासकीय कार्य में बाधा) का ब्रह्मास्त्र चला देती है। इस फैसले के बाद पुलिस ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेगी। प्रेस की स्वतंत्रता पर मुहर: कोर्ट ने परोक्ष रूप से यह माना है कि आधी रात को भी अगर पुलिस कुछ गलत कर रही है, तो मीडियाकर्मी को वहां जाकर सवाल पूछने और सच दिखाने का पूरा अधिकार है। राइट टू स्पीडी ट्रायल (Speedy Trial): यह फैसला देश के हर उस नागरिक के लिए मिसाल है, जिसे पुलिस सालों-साल ‘जांच पेंडिंग’ रखकर अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर करती है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि स्पीडी ट्रायल सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिंदगी और आजादी (Article 21) से जुड़ा मौलिक अधिकार है।




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