Chhattisgarh News छत्तीसगढ़ का ‘डिजिटल भूत’ और पत्थलगांव का प्रशासनिक सर्कस: जहाँ ट्रांसफर के बाद भी आत्माएं करती हैं रजिस्ट्री!..

ब्यूरोचीफ राकेश कुमार साहू जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
जशपुर। सुशासन के परम-पवित्र दावों के बीच, जशपुर जिले के पत्थलगांव से ‘अधिकारी-कर्मठता’ की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिस पर दुनिया भर के पैरानॉर्मल एक्सपर्ट्स (भूत-प्रेत शोधकर्ताओं) को शोध करना चाहिए। यहाँ के राजस्व विभाग ने साबित कर दिया है कि एक सच्चा अधिकारी कुर्सी से उठने के बाद भी ‘आध्यात्मिक’ रूप से अपनी फाइलों से जुड़ा रहता है! क्रोनोलॉजी समझिए इस अद्भुत ‘जादूगरी’ की : तारीख थी 9, जब पूर्व तहसीलदार महोदय (प्रांजल मिश्रा) का पत्थलगांव से तबादला हुआ और वे बाकायदा कार्यमुक्त (Relieve) भी हो गए। कोई आम इंसान होता तो अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर नई पोस्टिंग की तरफ निकल लेता, लेकिन यहाँ तो ‘साहब’ की ‘डिजिटल आत्मा’ ने तहसील का मोर्चा संभाल लिया! 9 से 13 तारीख के बीच, जब नियमतः उनके पास कलम चलाने की कोई शक्ति नहीं थी, उसी ‘अदृश्य शक्ति’ ने धड़ाधड़ 33 रजिस्ट्रियां निपटा दीं। इसे कहते हैं असली ‘वर्क फ्रॉम घोस्ट’ (Work from Ghost) मॉडल! जनता अब कन्फ्यूज है कि पत्थलगांव में रजिस्ट्री साहब करते हैं या उनका भूत?
आदिवासी जमीन का ‘महायज्ञ’ और
भू-माफिया का ‘प्रसाद’: इस ‘भूतिया’ ओवरटाइम के दौरान चिड़ापारा की बेशकीमती आदिवासी भूमि (खसरा नंबर 333/1, रकबा 1.052 हेक्टेयर) की बलि चढ़ा दी गई। 1956 से आदिवासी परिवार (लुईस जाति उरांव आदि) के नाम दर्ज इस जमीन को रातों-रात सामान्य बनाकर, 333/5 और 333/8 जैसे नए नंबरों में काटा गया और धनाढ्य व्यापारियों व गैर-आदिवासियों को ‘प्रसाद’ की तरह बांट दिया गया। इस महायज्ञ में एसडीएम ऋतुराज सिंह बिसेन, पूर्व तहसीलदार प्रांजल मिश्रा, तत्कालीन तहसीलदार उमा सिंह, पटवारी मदन भगत, वर्तमान पटवारी रविनारायण राठिया और भू-माफिया सुरेश यादव जैसे दिग्गजों ने जो ‘आपसी साठ-गांठ की आहुतियां’ दी हैं, वो राजस्व विभाग के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होनी चाहिए!
कलेक्टर साहब का ‘मौन व्रत’ और मलाई-मिठाई का ‘असर’ : इस प्रशासनिक डकैती की गंभीरता को देखते हुए, 17 जून 2026 को आवेदिका सुचिता एक्का और पीड़ित पक्ष ने सारे पुख्ता सबूतों के साथ जशपुर कलेक्टर महोदय के दरबार में एक विस्तृत शिकायती पत्र प्रस्तुत किया। लेकिन लगता है जिला प्रशासन ने ‘विपश्यना’ (गहन ध्यान और मौन) जॉइन कर लिया है। इतनी बड़ी जालसाजी की लिखित शिकायत के बाद भी रजिस्ट्रियों पर कोई ‘स्टे’ नहीं, कोई जांच टीम नहीं! क्षेत्र की जनता अब चुटकी लेते हुए पूछ रही है कि क्या ‘ऊपर तक’ पहुंची ‘सप्रेम भेंट’ और ‘मलाई-मिठाई’ का डिब्बा इतना भारी था कि पूरा का पूरा प्रशासन ही ‘मीठे के नशे’ में गहरी नींद सो गया है? बिना किसी बड़े वरदहस्त के छोटे कर्मचारियों में इतना बड़ा हौसला आ जाना, किसी प्रशासनिक चमत्कार से कम नहीं है। आदिवासी मुख्यमंत्री के ‘सुशासन’ की अग्निपरीक्षा : छत्तीसगढ़ में वर्तमान में विष्णुदेव साय जी की सरकार है, जो खुद आदिवासी समाज से आते हैं और ‘सुशासन’ का डंका पीटते नहीं थकते। लेकिन उनके इस ‘रामराज्य’ में आदिवासियों की पैतृक जमीन दिन-दहाड़े प्रशासनिक जादूगरी का शिकार हो रही है। अब सवाल यह है कि: क्या कलेक्टर महोदय अपनी कुंभकर्णी नींद से जागकर इन 33 ‘भूतिया’ रजिस्ट्रियों को तत्काल प्रभाव से शून्य घोषित करेंगे? क्या बैक-डेट में लॉग-इन आईडी का इस्तेमाल करने वाली और ‘डिजिटल दस्तखत’ करने वाली उन ‘भटकती आत्माओं’ (दोषी अधिकारियों) पर FIR दर्ज कर उन्हें मोक्ष (जेल) प्रदान किया जाएगा?
अगर जल्द ही इस प्रशासनिक ‘सर्कस’ का तंबू नहीं उखड़ा और न्याय नहीं हुआ, तो सर्व आदिवासी समाज ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे पूरे जशपुर जिले में उग्र आंदोलन की आग जलाएंगे। अब देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस ‘महाघोटाले’ को सिस्टम की ‘तकनीकी खराबी’ बताकर पल्ला झाड़ता है या वाकई में किसी ‘भ्रष्ट भूत’ को पकड़कर सलाखों के पीछे भेजता है!




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