
पटना जू में बाघों की दहाड़ से गूंज रहा है पर्यावरण का संदेश, दो सफेद बाघ बने आकर्षण का केंद्र
— अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर विशेष रिपोर्ट

पटना। राजधानी पटना स्थित संजय गांधी जैविक उद्यान, जिसे आमतौर पर पटना चिड़ियाघर कहा जाता है, न सिर्फ बिहार का गौरव है, बल्कि वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ा आकर्षण भी है। चिड़ियाघर में बाघों की मौजूदगी हर उम्र के पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। वर्तमान में पटना जू में कुल छह बाघ हैं — तीन नर (नकुल, विक्रम, केसरी) और तीन मादा (संगीता, भवानी, रानी)। इनमें भवानी और केसरी सफेद बाघ हैं, जो खास आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
1975 में आया था पहला बाघ ‘मोती’

पटना जू में बाघों की कहानी 12 अक्टूबर 1975 को शुरू हुई, जब दिल्ली जू से ‘मोती’ नामक बाघ को लाया गया। इसके बाद 1980 में असम से ‘फौजी’ और ‘बुल्बोरानी’ नाम की दो बाघिनें लाई गईं। इनसे प्रजनन की शुरुआत हुई और 1 जनवरी 1983 को पहली मादा शावक ‘गीता’ का जन्म हुआ। उसी वर्ष जून में ‘राकी’, ‘मोना’ और ‘जैकी’ नामक तीन शावक भी जन्मे।
सफेद बाघ की कहानी: पटना को पहली बार 2011 में मिला था सफेद बाघ
12 अगस्त 2011 को पटना जू को हैदराबाद और तिरुपति से लाए गए ‘भीमा’ और ‘स्वर्णा’ के जरिए पहला सफेद बाघ मिला। इन दोनों से कुल 12 शावकों का जन्म हुआ, जिनमें आठ सफेद शावक थे। वर्तमान में भवानी पटना जू में है, जबकि स्वर्णा राजगीर जू सफारी में पर्यटकों को आकर्षित कर रही है।
हालिया जन्म और बाघों की अदला-बदली

30 अगस्त 2019 को वेंडालूरु जू से आए नकुल और संगीता ने 25 मई 2022 को चार शावकों — रानी, विक्रम, मगध और केसरी को जन्म दिया। इस तरह पटना जू में बाघों की संख्या बढ़ी।
पिछले 50 वर्षों में पटना जू ने देश के विभिन्न चिड़ियाघरों को कुल 10 बाघ दिए हैं। इनमें रांची जू को पांच, राजगीर को तीन, कोलकाता और बनेरघट्टा को एक-एक बाघ दिए गए हैं। वहीं, नई ब्लडलाइन लाने के लिए दिल्ली, असम, नंदनकानन, हैदराबाद, तिरुपति और वेंडालूरु से बाघ लाए गए हैं।
पटना जू पर एक नजर:

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वर्तमान में छह बाघ, जिनमें दो सफेद हैं
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12 अगस्त 2011 को चिड़ियाघर को मिला था पहला सफेद बाघ
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अब तक कई बाघ शावकों का सफल प्रजनन
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अदला-बदली के तहत देशभर में भेजे गए 10 बाघ
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हर साल 29 जुलाई को मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस
बाघ संरक्षण की जरूरत
एक समय था जब भारत में बाघों की संख्या एक लाख से अधिक थी। लेकिन अब इनकी संख्या घटकर कुछ हजारों में सिमट गई है। ऐसे में पटना जू जैसे संस्थान बाघ संरक्षण और जागरूकता के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।



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