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Madhya Pradesh News आचार्य श्री विवेकसागर जी बोले संसार नश्वर है,आत्मकल्याण के लिए धर्म और गुरु भक्ति ही सच्चा मार्ग।

बड़ा मलहरा में हुई आचार्य श्री की मंगल आगवानी,धर्मसभा में आत्मकल्याण,वैराग्य और पुरुषार्थ का दिया संदेश।

ब्यूरो चीफ राजू जोशी महाराज छतरपुर मध्य प्रदेश

बड़ा मलहरा//नगर में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विवेकसागर जी महाराज का श्रद्धा,भक्ति और उत्साह के साथ मंगल आगमन हुआ।इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।धर्मसभा के प्रारंभ में आचार्य श्री का विधिवत पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य समाजजनों को प्राप्त हुआ। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि यह संसार अनादि काल से है और अनंत काल तक रहेगा लेकिन इसमें रहने वाला प्रत्येक जीव जन्म और मृत्यु के बंधन में बंधा हुआ है।उन्होंने कहा कि यदि जीवन का वास्तविक हित चाहते हैं तो गुरु की वाणी को एकाग्रचित्त होकर सुनना और उसे जीवन में उतारना आवश्यक है।शरीर के सुख-साधनों में ही लगे रहने से आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता।


आचार्य श्री ने कहा कि संसार का प्रत्येक पदार्थ नश्वर है।जिसकी उत्पत्ति हुई है उसका विनाश भी निश्चित है।इसलिए मनुष्य को नश्वर वस्तुओं के प्रति मोह छोड़कर आत्मकल्याण की दिशा में पुरुषार्थ करना चाहिए।उन्होंने कहा कि धर्म केवल दिखावे या अल्प समय के लिए नहीं, बल्कि गहन भाव और निरंतर साधना के साथ किया जाए तभी उसका श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बैंक बैलेंस प्रतिदिन बचत करने से बढ़ता है, वैसे ही पुण्य का संचय भी प्रतिदिन देव पूजा,गुरु उपासना,स्वाध्याय एवं धर्म ध्यान से होता है।जैन कुल में जन्म लेना और अरिहंत प्रभु का दर्शन प्राप्त होना भी पूर्व जन्मों के महान पुण्यों का परिणाम है। आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य धन,व्यापार और सांसारिक उपलब्धियों की चिंता में तो लगा रहता है लेकिन गुरु भक्ति और आत्मचिंतन के लिए समय नहीं निकालता।वस्तुओं और संबंधों के प्रति राग-मोह ही दुख का कारण है।संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो स्थायी सुख दे सके। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वर्तमान में प्राप्त पुण्यशाली मनुष्य पर्याय अत्यंत दुर्लभ है।इसका सदुपयोग धर्म,संयम और आत्मकल्याण के पुरुषार्थ में करें क्योंकि यही जीवन को सार्थक बनाकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।धर्मसभा के अंत में श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के मंगल प्रवचनों का लाभ लेकर धर्मलाभ प्राप्त किया।

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