Chhattisgarh विकास की कीमत पर विनाश? छत्तीसगढ़ के हसदेव में कोयला खनन और उजड़ते जंगलों का सच

रिपोर्टर मनोज मानिकपुरी कोरबा छत्तीसगढ़
कोरबा/छत्तीसगढ़: क्या देश को रोशन करने वाले कोयले के लिए हमारे फेफड़ों (जंगलों) को काटना अनिवार्य है? यह एक ऐसा सवाल है जो आज छत्तीसगढ़ के हर नागरिक और पर्यावरण प्रेमी के जहन में गूंज रहा है। हाल ही में सामने आए एक पोस्टर और स्थानीय स्तर पर उठ रही आवाजें एक बड़े संकट की ओर इशारा कर रही हैं।
🌲 जंगल खत्म, तो जिंदगी कैसे बचेगी?
पोस्टर में उठाए गए सवाल सीधे तौर पर हमारे अस्तित्व से जुड़े हैं। घने जंगलों को काटकर जिस तरह से जमीन को बंजर और पेड़ों को ठूंठ में बदला जा रहा है, उसने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है:
”अगर जंगल ही नहीं रहेंगे, तो हमें शुद्ध हवा कहाँ से मिलेगी? हमारी आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी कैसे बचेगी?”
🚜 कोयला तो निकला… लेकिन छत्तीसगढ़ उजड़ गया!
एक तरफ जहाँ अत्याधुनिक भारी मशीनें, डंपर और पोकलेन खदानों से दिन-रात कोयला निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ का पारंपरिक स्वरूप और प्राकृतिक सौंदर्य बिखर रहा है। कोयला खनन के कारण हो रहे नुकसान के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
जंगल कट रहे हैं: हजारों एकड़ में फैले घने पेड़ जमींदोज किए जा रहे हैं।
पानी सूख रहा है: खनन गतिविधियों के कारण भूजल स्तर (Water Level) तेजी से गिर रहा है और जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं।
गांव उजड़ रहे हैं: खदानों के विस्तार के कारण सदियों से रह रहे आदिवासियों और ग्रामीणों को विस्थापित होना पड़ रहा है।
❓ जिम्मेदार कौन?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस विनाश का असली जिम्मेदार कौन है? क्या आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी प्राकृतिक संपदा को हमेशा के लिए खो देंगे? छत्तीसगढ़ को बर्बादी से बचाने के लिए अब एक संतुलित नीति की सख्त जरूरत है, जहाँ विकास भी हो और पर्यावरण व स्थानीय संस्कृति की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।




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